हिमाचल में 10 साल में 64 हजार हेक्टेयर घट गया कृषि का क्षेत्रफल, सेब उत्पादन में भी कमी; आखिर क्या है वजह?
हिमाचल प्रदेश में पिछले 10 वर्षों में कृषि भूमि 64 हजार हेक्टेयर कम हो गई है, जिससे खाद्यान्न और सेब उत्पादन में भी गिरावट आई है।

हिमाचल प्रदेश में कृषि क्षेत्र कम हुआ है। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
10 वर्षों में हिमाचल की कृषि भूमि 64 हजार हेक्टेयर घटी।
सेब उत्पादन में भारी गिरावट, इस साल आधा रहने का अनुमान।
कृषि विश्वविद्यालय जलवायु-अनुकूल बीज और तकनीकें विकसित कर रहे।
राज्य ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश में कृषि का क्षेत्रफल 10 वर्ष में लगभग 64 हजार हेक्टेयर क्षेत्र कम हो गया। उत्पादन भी गिरा है। कुल खाद्यान्न उत्पादन 15.85 लाख टन से घटकर 15.49 लाख टन पहुंच गया है। इसमें सबसे बड़ा कारण वर्षा की अनिश्चितता है। प्रदेश में 70 प्रतिशत खेती वर्षा पर निर्भर है। इस साल मानसून में 11 प्रतिशत कम वर्षा हुई।
मौसम में बदलाव से सेब उत्पादन लगभग आधा रह सकता है। वर्ष 2025 में लगभग 3.30 करोड़ पेटी सेब का उत्पादन हुआ था। इस साल यह लगभग 1.50 करोड़ पेटी रहने का अनुमान है।
क्यों कम हो रही कृषि भूमि
गैर कृषि कार्यों के लिए कृषि भूमि का इस्तेमाल बढ़ा है। लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। खेती की बढ़ती लागत, बंदरों और बेसहारा पशुओं के कारण भी कई किसानों ने खेती छोड़ दी है। किसान गेहूं और मक्का जैसे पारंपरिक खाद्यान्नों के साथ सब्जियों और अन्य नकदी फसलों की ओर भी बढ़ रहे हैं। सब्जी उत्पादन क्षेत्र करीब 90 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया है। वर्ष 2020 में यह लगभग 86 हजार हेक्टेयर था।
कृषि विश्वविद्यालय ने बीज की उन्नत किस्में तैयार कीं
चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर बदली जलवायु परिस्थितियों में कृषि उत्पादन बनाए रखने, किसानों की आय व उत्पादकता बढ़ाने के लिए तकनीक खेत तक पहुंचाने में लगा है। प्रदेश में आठ कृषि विज्ञान केंद्र खोले गए हैं। विश्वविद्यालय ने परिस्थितियों के अनुकूल बीजों की किस्में विकसित की हैं। इन किस्मों से कम पानी में बेहतर उत्पादन हो सकता है।
इनमें गेहूं की तीन, धान की चार, मक्का की एक, जौ की चार, दलहनी फसलों की नौ, तिलहनी फसलों की दो, सब्जियों की तीन तथा चारे की चार किस्में शामिल हैं। उन्नत किस्मों के बारे में किसानों के बीच जाकर उन्हें जागरूक किया जा रहा है। गत वर्ष तिलहनी फसलों पर 1,932 प्रदर्शनियां लगाकर किसानों को बताया गया।
सेब की नई किस्में इसी माह लांच होंगी
डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी अनुसंधान व विस्तार गतिविधियों को पांच कृषि विज्ञान केंद्रों और सात अनुसंधान केंद्रों के माध्यम से बागवानों-किसानों तक पहुंचा रहा है। विश्वविद्यालय के दीक्षा समारोह में 22 अक्टूबर को सेब की छह नई किस्में लोकार्पित करेगा। विकसित तकनीकों को लोगों तक पहुंचाने के लिए कृषि, बागवानी विभागों और विवि के विज्ञानियों की पैकेज आफ प्रैक्टिस समिति गठित है। इसके तहत प्रतिवर्ष करीब 40 प्रशिक्षण शिविर लगाए जाते हैं। किसानों की समस्याओं का समाधान फोन, वाट्सएप, टीवी, रेडियो व इंटरनेट मीडिया पर किया जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन और कम वर्षा का फसलों पर असर पड़ता है। मौसम और भूमि उपयोग के पैटर्न में बदलाव आया है। कम पानी वाली व सूखा सहन करने वाली फसलों जैसे बाजरा, रागी और अन्य मोटे अनाज के साथ सब्जियों व नकदी फसलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
-सी पाल रासु, सचिव कृषि एवं बागवानी विभाग।
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