हिमाचल के शिक्षक असमंजस में: CBSE ने मूल्यांकन तो HP शिक्षा बोर्ड ने पेपर सेंटर में लगा दी ड्यूटी
हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों के शिक्षक सीबीएसई और हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड की तरफ से मिली अलग-अलग ड्यूटी को लेकर असमंजस में हैं। सीबीएसई ने ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश के शिक्षक अलग-अलग ड्यूटी को लेकर असमंजस में हैं। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
शिक्षकों को सीबीएसई मूल्यांकन और एचपी बोर्ड परीक्षा ड्यूटी मिली।
गैर-बोर्ड कक्षाओं के परिणाम भी तैयार करने का अतिरिक्त कार्य।
शिक्षक संघ ने शिक्षा विभाग से समाधान की मांग की।
राज्य ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश के 145 सरकारी स्कूलों को सीबीएसई से संबद्धता मिल गई है, लेकिन यहां तैयात शिक्षक असमंजस में हैं। सीबीएसई ने कई शिक्षकों की ड्यूटियां पेपर मूल्यांकन में लगाई हैं। वहीं, हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड ने भी तीन मार्च से शुरू होने वाली दसवीं और बारहवीं कक्षा की वार्षिक परीक्षाओं के आयोजन के लिए कुछ शिक्षकों की ड्यूटी परीक्षा केंद्र में लगा दी है।
इसके अतिरिक्त शिक्षकों को छठी, नौवीं और ग्यारहवीं कक्षाओं के वार्षिक परीक्षाओं के परिणाम भी तैयार करने हैं। शिक्षकों का कहना है कि उन्हें गैर बोर्ड कक्षाओं के परीक्षा परिणाम भी घोषित करने हैं, जिसके लिए उन्हें पेपर चेक करने की आवश्यकता है। इस स्थिति में वे असमंजस में हैं कि किस बोर्ड के आदेश का पालन करें?
शिक्षक संघ ने उठाया मुद्दा
हिमाचल प्रदेश स्कूल संयुक्त शिक्षक महासंघ ने इस मुद्दे को शिक्षा विभाग के समक्ष उठाया था। सोमवार को शिमला स्थित राज्य सचिवालय में सचिव शिक्षा राकेश कंवर की अध्यक्षता में इस विषय पर बैठक हुई। मामले पर विस्तृत चर्चा की गई और जल्द ही निर्णय लेने का आश्वासन दिया गया। बैठक में स्कूल शिक्षा निदेशक आशीष कोहली, अतिरिक्त निदेशक बाबू राम और अतिरिक्त निदेशक जीवन नेगी मौजूद थे।
न टकराव चाहते हैं न कोर्ट के चक्कर : नेगी
स्कूल प्रवक्ता संघ के अध्यक्ष अजय नेगी व संयुक्त शिक्षक महासंघ के प्रेस सचिव जयराम शर्मा ने बताया कि शिक्षकों को विश्वास में लिए बिना सीबीएसई प्रणाली लागू करना कठिन है। सरकार यदि इस प्रणाली को सफल बनाना चाहती है तो संयुक्त शिक्षक महासंघ को वार्ता के लिए बुलाए, ताकि सभी मामलों पर विस्तृत चर्चा हो सके। शिक्षकों को विश्वास में लेना जरूरी है तभी यह प्रणाली सफल होगी। वह योजना का विरोध नहीं करना चाहते। न टकराव चाहते हैं न ही कोर्ट कचहरी के चक्कर। बार-बार शिक्षकों की अनदेखी की जाती है तो मजबूरन आंदोलन करना पड़ेगा।