एक साल में ही खुल गई हरियाणा कांग्रेस के संगठन की पोल, अब जिलाध्यक्षों के रिपोर्ट कार्ड पर हाईकमान की नजर
हरियाणा कांग्रेस में 11 साल बाद बने जिला संगठन का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया गया है, जिससे हाईकमान चिंतित है। करीब दो-तिहाई जिलाध्यक्षों का प्रदर्शन ...और पढ़ें

एक साल में ही खुल गई हरियाणा कांग्रेस के संगठन की पोल। फाइल फोटो
HighLights
दो-तिहाई जिलाध्यक्षों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया गया।
जिलाध्यक्षों और स्थानीय विधायकों के बीच टकराव बढ़ रहा है।
हाईकमान सात जिलाध्यक्षों को बदलने की तैयारी में है।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। हरियाणा कांग्रेस में 11 साल बाद खड़ा किया गया जिला संगठन अब खुद पार्टी हाईकमान के लिए सवाल बनता जा रहा है। पिछले साल 12 अगस्त को 32 जिला कांग्रेस अध्यक्षों की नियुक्तियों के साथ कांग्रेस ने लंबे अंतराल के बाद संगठन को जमीन पर सक्रिय करने का दावा किया था।
उस समय पार्टी ने ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाने का संदेश दिया था, जो जनता के बीच सक्रिय हों, संगठन को मजबूत करने की क्षमता रखते हों और कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव रखते हों। लेकिन करीब एक साल बाद सामने आ रहा फीडबैक इस दावे की तस्वीर बदलता नजर आ रहा है।
करीब दो-तिहाई जिलाध्यक्षों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं
हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी संजय दत्त इन दिनों जिलों के दौरे पर हैं और करीब डेढ़ दर्जन संगठनात्मक जिलों में बैठकें कर चुके हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इन बैठकों से मिले फीडबैक में करीब दो-तिहाई जिलाध्यक्षों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया गया है।
संगठन की निष्क्रियता के साथ-साथ सबसे बड़ी समस्या जिलाध्यक्षों और स्थानीय विधायकों के बीच बढ़ता टकराव है। यानी जिस जिला संगठन को कांग्रेस ने चुनावी मशीनरी की रीढ़ बनाने की कोशिश की थी, वही कई जगह गुटीय राजनीति का अखाड़ा बनता दिख रहा है।
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सिरसा कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान इसका सबसे मुखर उदाहरण बनकर सामने आई है। विधायक गोकुल सेतिया और जिला अध्यक्ष संतोष बेनीवाल के बीच सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप ने पार्टी के भीतर की खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि जब स्थानीय स्तर पर पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधि और संगठन के प्रमुख चेहरे ही एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हों तो कांग्रेस का बूथ और कार्यकर्ता स्तर का ढांचा कैसे मजबूत होगा।
कांग्रेस संगठन के पुनर्गठन की कवायद भी शुरू
हिसार की स्थिति भी पार्टी के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। हिसार शहरी के जिला अध्यक्ष बजरंग दास गर्ग ने पार्टी के किसी निर्णय का इंतजार किए बिना ही पद से इस्तीफा दे दिया। बजरंग गर्ग हालांकि पहले से ही पार्टी के निशाने पर चल रहे थे। हिसार जिले में संगठनात्मक खींचतान किसी से छिपी नहीं है। इसके साथ ही कांग्रेस संगठन के पुनर्गठन की कवायद भी शुरू हो चुकी है।
पंचकूला में दो जिला अध्यक्ष बनाए जाने की योजना है, जबकि फरीदाबाद में शहरी और ग्रामीण संगठन अलग-अलग करने की तैयारी है। हांसी में पहली बार जिला अध्यक्ष नियुक्त किया जाना है। इन बदलावों से साफ है कि कांग्रेस अब पुराने संगठनात्मक ढांचे को जस का तस चलाने की बजाय जरूरत के मुताबिक नए समीकरण बनाने की तैयारी में है।
कांग्रेस की मुश्किल केवल जिला स्तर तक सीमित नहीं है। हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश पदाधिकारियों की नियुक्तियां भी अभी तक पूरी नहीं हो सकी हैं। ऐसे में पार्टी के पास निचले स्तर पर जिलाध्यक्ष तो हैं, लेकिन उनके ऊपर प्रभावी प्रदेश संगठन का ढांचा पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाया है।
बड़े साहब फील्ड में और छोटे साहब विदेश दौरे पर
सबसे गंभीर स्थिति पार्टी के मीडिया विभाग की बताई जा रही है। विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस के लिए सरकार को घेरने और अपने राजनीतिक एजेंडे को जनता तक पहुंचाने में मीडिया विभाग की भूमिका अहम हो जाती है, लेकिन फिलहाल यह विभाग प्रभावी तरीके से सक्रिय नजर नहीं आ रहा।
विभाग के प्रभारी विदेश में निजी यात्रा पर हैं और कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी संजय दत्त और कांग्रेस अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह जिलों में संगठन की नब्ज टटोल रहे हैं।
पहले चरण में सात जिला अध्यक्षों को बदलने की तैयारी
हाईकमान ने अब पहले चरण में करीब सात जिलाध्यक्षों को बदलने या नए सिरे से नियुक्तियां करने के संकेत दिए हैं। इसके लिए चार पर्यवेक्षक डा. एन रघुवीरा रेड्डी, यशोमति ठाकुर, उमंग सिंगर और अजय कुमार लल्लू नियुक्त किए जा चुके हैं।
पर्यवेक्षकों की तैनाती इस बात का संकेत है कि हाईकमान अब जिलाध्यक्षों के चयन में स्थानीय गुटबाजी से ऊपर उठकर संगठनात्मक प्रदर्शन और स्वीकार्यता को कसौटी बनाना चाहता है। असल चुनौती सिर्फ सात जिलाध्यक्ष बदलने की नहीं है।
कांग्रेस के सामने सवाल यह है कि क्या वह जिला स्तर पर नेताओं के बीच समन्वय की ऐसी व्यवस्था खड़ी कर पाएगी, जिसमें विधायक, पूर्व विधायक, टिकट दावेदार और संगठन के पदाधिकारी एक ही राजनीतिक लक्ष्य के लिए काम करें।