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    'रपट रोजनामचा ही जमीन पर कब्जा मानने के लिए पर्याप्त', सोनीपत भूमि अधिग्रहण पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

    Updated: Mon, 10 Aug 2026 02:00 PM (IST)

    पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सोनीपत भूमि अधिग्रहण मामले में फैसला सुनाया है कि अधिग्रहित जमीन पर सरकार का भौतिक कब्जा जरूरी नहीं है। ...और पढ़ें

    सोनीपत भूमि अधिग्रहण पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला (फाइल फोटो)

    सोनीपत भूमि अधिग्रहण पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला (फाइल फोटो)

    राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अधिग्रहित जमीन पर सरकार को तब तक शारीरिक रूप से मौजूद रहने, पुलिस या किसी अन्य व्यक्ति को तैनात करने, खेती करने अथवा वहां निवास करने की आवश्यकता नहीं है, जब तक उस भूमि का अधिग्रहण के उद्देश्य के अनुरूप उपयोग शुरू न हो जाए।

    हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से रपट रोज़नामचा (कब्जा लेने संबंधी राजस्व प्रविष्टि) तैयार किया जाना ही भूमि का भौतिक कब्जा लेने के लिए पर्याप्त है। जस्टिस विकास बहल और जस्टिस सुभाष मेहला की खंडपीठ ने सोनीपत जिले के भूमि मालिकों की ओर से दायर याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

    याचिकाकर्ताओं ने छह मई 1982 की भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा चार के तहत जारी अधिसूचना, दो मई 1985 की धारा छह की घोषणा और एक मई 1987 के अवार्ड को चुनौती दी थी। मामला 27 कनाल पांच मरला भूमि तथा एक अन्य भूखंड में उनके एक-चौथाई हिस्से से संबंधित था।

    राज्य सरकार ने हाई कोर्ट को बताया कि सोनीपत में आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के सार्वजनिक उद्देश्य से भूमि का अधिग्रहण किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने अधिनियम की धारा 5-ए के तहत कोई आपत्ति भी दाखिल नहीं की थी।

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    धारा चार की अधिसूचना जारी होने के समय भूमि खाली थी और एक मई 1987 की रपट रोज़नामचा के माध्यम से उसका कब्जा ले लिया गया था। भूमि अधिग्रहण कलेक्टर की ओर से अवार्ड घोषित करते समय 34,91,466 रुपये का पूरा मुआवजा भी टेंडर किया गया था।

    यह राशि कलेक्टर के खाते में जमा रही और भूमि मालिकों को भुगतान के लिए उपलब्ध थी। कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता भी यह राशि प्राप्त कर सकते हैं। याचिकाकर्ताओं ने हालांकि दलील दी कि वास्तविक रूप से जमीन का कब्जा नहीं लिया गया।

    उन्होंने 31 अगस्त 2008 के रोज़नामचा वकायाती का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि एक मई 1987 की रपट रोज़नामचा जमाबंदी अथवा रिकॉर्ड ऑफ राइट्स में दर्ज नहीं थी। यह भी तर्क दिया गया कि कोई मुआवजा वितरित नहीं हुआ, लेआउट प्लान तैयार नहीं किया गया और किसी तीसरे पक्ष का अधिकार भी नहीं बनाया गया।

    हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि संबंधित दस्तावेज से स्पष्ट है कि एक मई 1987 को रपट तैयार की गई थी। हालांकि शुरुआत में इसे जमाबंदी में दर्ज नहीं किया गया था, लेकिन बाद में इसकी प्रविष्टि कर दी गई और वर्तमान में यह जमाबंदी में विधिवत दर्ज है।

    खंडपीठ ने रपट रोज़नामचा तैयार करने और बाद में उसे जमाबंदी में दर्ज करने के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं बताया गया है जिसके तहत केवल इस आधार पर रपट रोज़नामचा को नजरअंदाज कर दिया जाए कि उस समय तक उसे जमाबंदी में दर्ज नहीं किया गया था।

    हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जब राज्य सरकार भूमि का अधिग्रहण करती है और कब्जा लेने का मेमो तैयार करती है, तो यह भूमि का भौतिक कब्जा लेना माना जाता है।” कोर्ट ने आगे कहा कि अधिग्रहित संपत्ति पर कब्जा बनाए रखने के लिए सरकार को किसी अन्य व्यक्ति या पुलिस बल को वहां तैनात करने और भूमि पर खेती शुरू करने की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह कब्जा लेने के बाद सरकार के लिए उस संपत्ति में रहना या उसका भौतिक रूप से उपयोग करना भी आवश्यक नहीं है।