'तलाक के बाद भेजे अश्लील मैसेज', महिला के आरोप नहीं हुए साबित; 13 वर्ष चली कानूनी लड़ाई के बाद पूर्व पति को राहत
पंचकूला अदालत ने तलाक के बाद ई-मेल पर अश्लील मैसेज भेजने के आरोप में पूर्व पति को बरी करने का फैसला बरकरार रखा है। 13 साल चली कानूनी लड़ाई में महिला अ ...और पढ़ें

वर्ष 2013 में दर्ज मामले में कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला।
HighLights
कोर्ट ने कहा- संदेह पर नहीं हो सकती सजा।
ट्रायल कोर्ट ने किया था बरी, आदेश बरकरार।
महिला ने फैसले को सेशन कोर्ट में दी थी चुनौती।
जागरण संवाददाता, पंचकूला। तलाक के बाद शुरू हुए विवाद, मानसिक प्रताड़ना के आरोप और करीब 13 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद पंचकूला अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए महिला के पूर्व पति को मिली बरी होने की राहत बरकरार रखी है।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसके खिलाफ ठोस और स्वीकार्य साक्ष्य मौजूद न हों।
मामला वर्ष 2013 का है। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि तलाक के बाद उसके पूर्व पति ने ई-मेल पर अश्लील मैसेज भेजकर उसे मानसिक रूप से परेशान किया और उसकी नई वैवाहिक जिंदगी को प्रभावित करने की कोशिश की।
शिकायत के आधार पर चंडीमंदिर थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। ट्रायल कोर्ट ने 14 दिसंबर 2018 को साक्ष्यों के अभाव में आरोपित को बरी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता ने सेशन कोर्ट में अपील दायर की।
अदालत ने अपील पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और महिला की अपील खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता यह निश्चित रूप से साबित नहीं कर सकी कि विवादित ई-मेल आइडी वास्तव में आरोपित (पूर्व पति) की ही थी।
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उसने यह भी स्वीकार किया कि उस ई-मेल आइडी या इंटरनेट का इस्तेमाल कोई अन्य व्यक्ति भी कर सकता था। जिस कथित अश्लील दस्तावेज को साक्ष्य बताया गया, वह शिकायतकर्ता के ई-मेल खाते में नहीं मिला।
अदालत ने यह भी माना कि इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत अनिवार्य प्रमाणपत्र पेश नहीं किया गया। साथ ही जांच अधिकारी की गवाही भी अदालत में नहीं कराई गई, जिससे आरोपित और कथित ई-मेल के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं हो सका।
इन परिस्थितियों में अदालत ने कहा कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा, इसलिए आरोपित को मिली बरी होने की राहत में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।