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    भ्रूण लिंग जांच करने वालों के खिलाफ छेड़ी जंग, कई गिरोहों का पर्दाफाश, कुरुक्षेत्र में मिसाल बनीं आशा वर्कर निर्मला

    Updated: Mon, 23 Mar 2026 05:19 PM (IST)

    कुरुक्षेत्र की आशा वर्कर निर्मला भ्रूण लिंग जांच और हत्या के खिलाफ एक मिसाल बन गई हैं। वह डिकोय बनकर 12 से अधिक छापों में गिरोहों का पर्दाफाश कर चुकी ...और पढ़ें

    आशा वर्कर निर्मला। फोटो जागरण

    आशा वर्कर निर्मला। फोटो जागरण

    HighLights

    1. निर्मला ने 12 से अधिक भ्रूण लिंग जांच गिरोहों का पर्दाफाश किया।

    2. उनकी सूझबूझ से 17 से ज्यादा आरोपी सलाखों के पीछे पहुंचे।

    3. वह महिलाओं को डिकोय बनने और समाज को प्रेरित करती हैं।

    विनीश गौड़, कुरुक्षेत्र। धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की धरा पर एक महिला ने भ्रूण लिंग जांच और हत्या जैसे जघन्य अपराधों के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। गांव यारी की आशा वर्कर निर्मला साहस, संकल्प और सामाजिक चेतना की मिसाल बन चुकी हैं।

    वह मानो मां कात्यायनी का रूप धारण कर उन दुष्ट प्रवृत्तियों का अंत करने में जुटी हैं, जो गर्भ में ही लिंग जांच करा बेटियों की सांसें छीन लेती हैं। निर्मला आज केवल एक आशा वर्कर नहीं, बल्कि उस बदलाव की प्रतीक हैं, जिसकी समाज को विशेष आवश्यकता है- जहां बेटियां सुरक्षित हो और सोच सशक्त बने।

    चाची-मामी बनकर देती है ऑपरेशन को अंजाम

    निर्मला का कार्य केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं है। वह स्वास्थ्य विभाग की छापेमारी के दौरान वह कभी डिकोय की बुआ बनती हैं, तो कभी चाची या मामी का रूप धर भ्रूण लिंग जांच करने वाले गिरोहों के बीच पहुंच जाती हैं। उनकी सूझबूझ और साहस के चलते अब तक 12 से अधिक छापेमार कार्रवाइयों में कई गिरोहों का पर्दाफाश हो चुका है और 17 से ज्यादा आरोपितों सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं।

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    प्रेरक बन डिकोय को करती तैयार

    निर्मला केवल खुद ही जोखिम नहीं उठातीं, बल्कि दूसरों को भी इस मुहिम से जोड़ती हैं। वह अब तक 12 से अधिक महिलाओं को डिकोय बनने के लिए प्रेरित कर चुकी हैं। जब कोई महिला डरती है या पीछे हटने लगती है, तो निर्मला उसका हौसला बनकर साथ खड़ी रहती हैं। उनके लिए यह काम किसी पुरस्कार या सम्मान से कहीं ऊपर है। यह उनके लिए समाज के प्रति कर्तव्य है।

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    बदलनी होगी संकीर्ण सोच : निर्मला

    निर्मला ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग का साथ देने में उन्हें कोई डर नहीं लगता, बल्कि यह उनकी जिम्मेदारी है। बहुत से लोग कुछ रुपये के लिए कन्या भ्रूण जन्म से पहले ही मौत दे देते हैं। अल्ट्रासाउंड के प्रशिक्षित या जानकार नहीं होते।

    गर्भवती के पेट पर खिलौनों और प्रोब को घुमा कुछ भी बता देते हैं खुद तो अपनी जेब भर लेते हैं, मगर बहुत से दंपती इन लोगों की बातों में आकर भ्रूण हत्या करवा देते हैं और बाद में पता लगता है कि जिसे मरवा डाला वह कन्या भ्रूण नहीं था। लोगों को संकीर्ण सोच बदलनी चाहिए।

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    समाज को करती प्रेरित, कई महिलाएं साथ जुड़ीं

    दसवीं पास निर्मला की सामाजिक समझ और जागरूकता प्रशंसनीय है। वह गांव-गांव जाकर लोगों को बेटा-बेटी में भेदभाव की सोच से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करती हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों से जोड़कर महिलाओं को सशक्त बना रही हैं।

    साथ ही, टीबी मरीजों और हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं को समय पर इलाज दिलाने में भी अहम भूमिका रहती है। उनके प्रयासों का परिणाम है कि कई महिलाएं उनके साथ जुड़कर उनकी चेतना को आगे बढ़ा रही हैं।

    परिवार भी साथ खड़ा

    निर्मला की इस साहसिक यात्रा में उनका परिवार भी उनके साथ मजबूती से खड़ा है। उनके पति, बेटा और बेटियां सभी उनके इस जज्बे पर गर्व महसूस करते हैं।