Babita Singh Reporting Review: मर्डर मिस्ट्री और समाज का आईना दिखाती फिल्म, निमिषा सजयन ने जीता दिल
प्राइम वीडियो पर आई फिल्म 'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' (Babita Singh Reporting) एक महिला पुलिसकर्मी की कहानी है जो सस्पेंड होने ...और पढ़ें

मर्डर मिस्ट्री में छिपा समाज का सच, पढ़ें पूरा रिव्यू

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अंकित सिंह तोमर, नई दिल्ली। अगर आपके जीवन में सबकुछ सही हो, तो भला वो जीवन कैसे हो सकता है। प्यार, परिवार, दोस्ती, जिम्मेदारियां और फिर होने वाली कुछ ऐसी घटनाएं जो आपके जीवन को बदल देती हैं, कुछ यही कहती है Amazon Prime Video पर आई नई फिल्म Babita Singh Reporting।
इस फिल्म की मुख्य किरदार निमिषा सजयन हैं, जिन्होंने फिल्म में एक महिला पुलिसकर्मी का किरदार निभाया है, जो परिवार और फर्ज के बीच अटकी हैं, लेकिन इसी बीच वो सस्पेंड हो जाती हैं और सस्पेंड होने के बाद अपने बचपन के दोस्त के मर्डर की गुत्थी को सुलझाती हैं। अब क्या फिल्म की कहानी की गुत्थी भी सुलझी हुई, या नहीं? आइए जानते हैं।
क्या है फिल्म की कहानी?
निमिषा सजयन, बरुण सोबती और राजेश कुमार जैसे सितारों से सजी ये फिल्म (Babita Singh Reporting Movie Review) ओटीटी (O) प्लेटफॉर्म प्राइम वीडियो पर आई है। 'पाताल लोक' और 'कोहरा' जैसी सीरीज बनाने वाले सुदीप शर्मा ने इसे बनाया है। फिल्म की कहानी असल में बबीता सिंह (Nimisha Sajayan) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो निडर है और लोग उसे कम आंकते हैं और वह अपनी पूरी जिंदगी में हमेशा खुद से पहले दूसरों को तवज्जो देती आई है। बबीता को लोग प्यार से बेबी बुलाते हैं।

कहानी की शुरूआत में दिखाया जाता है कि कैसे, बबीता सिंह अपने सीनियर ऑफिसर एस आई सेठी (Rajesh Kumar) से छुट्टियां मांगती हैं। अब सेठी उसे छट्टियां तो देते हैं, लेकिन बदले में कुछ शर्त रखते हैं। इसके बाद उनकी शर्तें मान जाती है, ताकि वो अपने पति शरद वशिष्ठ (Asnshuman Pushkar) के साथ ससुराल जा सके। सीनियर ऑफिसर की गलती का अपने सिर पर बबीता लेती है और वह सस्पेंड हो जाती है।

इसके बाद वह अपने गांव पहुंचती है, जहां वो अपने बचपन के दोस्त बंसी (Barun Sobti) से मिलने के लिए बेताब रहती है। इसी बीच बंसी की मौत हो जाती है और यहीं से शुरू होता है असली खेल। बबीता अपने दोस्त बंसी की मौत की गुत्थी सुलझाने में लग जाती है। पति और परिवार वाले सब उसे रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन बबीता इरादों की पक्की है, वो अपने फर्ज से नहीं डगमगाती और कातिल तक पहुंचती है। हालांकि इस बीच वो भावनाओं के सैलाब में भी उलझती है।
कैसी है फिल्म?
इस फिल्म (Babita Singh Reporting Review) की अलग बात यह है कि इस फिल्म में कोई हार्डकोर एक्शन, डार्क या फिर कोई बहुत बड़ा सस्पेंस या थ्रिल नहीं है। फिल्म की कहानी बस एक मर्डर की गुत्थी सुलझाने में जाती है। फिल्म की असली हीरो निमिषा सजयन यानि बबीता सिंह हैं, जो बाकियों की तरह बेखौफ, दबंग या रौबदार नहीं है।

वह थोड़ा हिचकिचाकर काम करती है, असमंजस में रहती है, लेकिन उसके इरादे पक्के रहते हैं। वो सच के साथ चलती है और ना ही उसके मन में कोई छल-कपट रहता है। ऑफिसर बबीता सिंह यानि बेबी के लिए फर्ज सबसे पहले है, अब वो चाहे परिवार का हो या फिर उसकी नौकरी का। फिल्म को एक स्लो-स्कैल पर बनाया है। सुदीप शर्मा ने इससे पहले 'पाताल लोक' (Paatal Lok) और 'कोहरा' (Kohrra) जैसी सीरीज बनाई हैं।
उनकी ये दोनों सीरीज क्राइम और थ्रिल से भरपूर थीं, लेकिन यहां उन्होंने कहानी में ट्विस्ट डाला है और इसे धीरे से आगे बढ़ाया है, जो दर्शकों को थामकर तो रखता है, लेकिन कहीं-कहीं कहानी का फ्लो टूटता जरूर है।

कैसा है फिल्म का डायरेक्शन
फिल्म के डायरेक्शन की कमान अंबिएका पंडित (Ambiecka Pandit) ने संभाली है, जिन्होंने इससे पहले 'ब्लैक वारंट' को बनाया है। वहीं फिल्म की कहानी को अमिता व्यास ने लिखा है। फिल्म में इस कहानी को अंबिएका ने खूबसूरती से दिखाया है कि कैसे महिलाओं को घर हो या बाहर, हर जगह समाज के तानों से जूझना पड़ता है। एक तरफ जहां कैसे बबीता अपने ही घरवालों से ताने सुनती है, कभी बच्चा न कर पाने के लिए तो कभी नौकरी के लिए।

घर और समाज दोनों ही जगह बबीता का किरदार संतुलन बनाता है। महिलाओं के साथ होने वाले इस रवैये को अंबिएका पंडिता ने सधे हुए अंदाज में डायरेक्ट किया है, जहां दोनों कहानियां खूबसूरती से फिल्म का हिस्सा बनती हैं। फिल्म के हर किरदार को बराबरी की पहचान मिली है और यही अंबिएका के डायरेक्शन की खूबसूरती रही है।
हालांकि इन सारे अच्छे पहलुओं के बाद फिल्म के कुछ सींस थोड़े उबाऊ लगते हैं और बार-बार कहानी का दोहराव सा होता है। फिल्म अपनी मंजिल तक पहुंचने में वक्त थोड़ा ज्यादा लगाती है और यही थोड़ा बोर भी करता है।
सितारों की कैसी रही एक्टिंग?
फिल्म में सभी एक्टर्स ने अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। फिल्म की रीढ़ निमिषा सजयन हैं, जिन्होंने बबीता के किरदार को भली-भांति जिया है। शायद इस फिल्म के लिए वो बिल्कुल परफेक्ट हैं। मानो यह किरदार उन्हीं के लिए बना हो। बबीता के किरदार में निमिषा हर उस आम महिला की कहानी दिखाती हैं, जो आज भी हमारे समाज का हिस्सा है। बरुण सोबती भी अपने किरदार में प्रभावी लगे हैं।

हालांकि फिल्म में उनका किरदार बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन हां जितनी बार वो स्क्रीन पर बंसी के किरदार में दिखे, उतना सही लगे। बंसी और बबीता के बीच दिखाए गए इमोशन कहानी में फिट बैठते हैं और अच्छे लगते हैं। हालांकि मेकर्स द्वारा बरुण के किरदार को थोड़ा बढ़ाया जा सकता था।
एस आई सेठी के किरदार में राजेश शर्मा (Rajesh Sharma) ने पूरी तरह से न्याय किया है। अंशुमन पुष्कर ने बबीता के पति के किरदार को सही से जिया। इसके अलावा बबीता के सास के रोल में सुनीता राजवर (Sunita Rajwar) हमेशा की तरह कमाल लगी हैं। वहीं गीतिका विद्या ओल्हान, नवल शुक्ला और प्रिया यादव समेत सभी ने अपने किरदारों में सही नजर आए।
फिल्म देखें या नहीं?
सुदीप शर्मा (Sudeep Sharma) ने इस फिल्म को बनाया है और उनकी इस फिल्म में अगर कुछ अच्छाइयां हैं तो इसकी कहानी में कुछ खामियां हैं, लेकिन फिल्म को देखने की बड़ी वजह बनी हैं निमिषा सजयन। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है तो वहीं संगीत ऐसा कुछ खास प्रभावी नहीं है। ओटीटी के दौर में आई ये फिल्म आपको सीरीज जैसा एहसास देती है, लेकिन शायद किरदारों की परफॉर्मेंस और इसकी कहानी इसे प्रभावी बनाती है।
ये फिल्म दिखाती है कि,महिलाओं को समाज-घर, दोनों जगह समाज के तानों से जूझना पड़ता है और दोहरे मापदंडों का सामना करना पड़ता है। फिल्म में कोई बड़े या रह जाने वाले डायलॉग्स नहीं है बल्कि अपनी छोटी-छोटी घटनाओं के चलते ये एक बड़ा मैसेज देती है और असल कहानी को सामने लाती है।
ये फिल्म महज एक मर्डर मिस्ट्री तक सीमित नहीं है, बल्कि ये घर-परिवार, जिम्मेदारियां, समाज और सोच के बीच खुद को तराशने की एक कहानी है। जाहिर है वीकेंड पर ये फिल्म आपकी वॉचलिस्ट में शामिल जरूर हो सकती है।
