Vadh 2 Review: जेल के अंदर दफन है कई राज, संजय मिश्रा-नीना गुप्ता की मूवी का क्लाइमेक्स खड़े कर देगा रोंगटे
Vadh 2 Movie Review: संजय मिश्रा और नीना गुप्ता की जोड़ी एक बार फिर से 'वध 2' के साथ लौट रही है। उनकी फिल्म शुक्रवार को सिनेमाघरों में आएगी। अगर आप वाक ...और पढ़ें

वध 2 मूवी रिव्यू/ फोटो- Instagram

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। साल 2022 में आई फिल्म 'वध' आम आदमी के शोषण और ताकतवर वर्ग के अत्याचार पर आधारित थी। फिल्म का मूल विचार यही था कि जब एक सामान्य व्यक्ति की सहनशक्ति जवाब दे देती है, तो वह अत्याचारी की हत्या को ‘वध’ का नाम देकर उसे न्यायसंगत ठहराने लगता है।
लगभग तीन साल बाद सिनेमाघरों में शुक्रवार को रिलीज होने वाली फिल्म 'वध 2' भी इसी विचारधारा को आगे बढ़ाती है। हालांकि, इसमें पहले भाग के पात्रों के नाम जरूर रखे गए हैं, लेकिन कहानी पूरी तरह नई है। मूल फिल्म के केंद्रीय पात्र संजय मिश्रा और नीना गुप्ता वध 2 को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाते हैं।
जेल कैदियों और पुलिसकर्मियों के इर्द-गिर्द घूमती है कहानी
इस बार कहानी मध्य प्रदेश के शिवपुरी स्थित जेल और वहां के कैदियों-पुलिसकर्मियों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। कहानी की शुरुआत युवा मंजू सिंह (मेहर देओल) को दो प्रेमियों की हत्या के आरोप में 28 साल की सजा सुनाए जाने से होती है। वहां से कहानी वर्तमान में आती है। मंजू (नीना गुप्ता) अब उम्रदराज हो चुकी है और जल्द रिहाई की उम्मीद कर रही है।
जेल में तैनात पुलिसकर्मी शंभुनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) के दिल में उसके लिए एक खास जगह है। इसी बीच प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) जेलर बनकर आते हैं, जिनकी सोच जातिगत ऊंच-नीच से प्रभावित है।
जेल में नैना (योगिता बिहानी) झूठे आरोपों में फंसकर आती है, जिस पर बाहुबली विधायक के भाई केशव (अक्षय डोगरा) की बुरी नजर रहती है। प्रकाश सिंह एक विवाद के बाद केशव की बेरहमी से पिटाई करता है।
उसके बाद केशव जेल से फरार हो जाता है। उनकी जांच के चलते प्रकाश निलंबित किया जाता है। लगभग 11 महीने बाद प्रकाश के सरकारी घर के पीछे केशव का शव मिलने से मामला फिर गर्मा जाता है और जांच नया मोड़ लेती है। धीरे-धीरे कई चौंकाने वाले राज सामने आते हैं और अंततः हत्यारे तक कहानी पहुंचती है।
खबरें और भी
रहस्य और रोमांच को बनाए रखती है 'वध-2'
फिल्म के क्लाइमेक्स में शंभुनाथ का संवाद है ‘इन्होंने हत्या नहीं, वध किया है’ यह पूरी कहानी का सार प्रस्तुत करता है। निर्देशक जसपाल सिंह संधू की तारीफ करनी होगी कि वध 2 में वह रहस्य और रोमांच को बनाए रखने में कामयाब रहते हैं। दोबारा मामला खुलने पर जैसे-जैसे अतीत की जांच आगे बढ़ती है आम आदमी की मजबूरी, जातिवादी मानसिकता, नैतिक उलझनें, पुलिस की पड़ताल और मानवीय रिश्तों की कड़ियों को वह बेहद सहज और प्रभावी ढंग से कहानी में पिरो देते हैं। हिंदी सिनेमा में जेल के भीतर आधारित दृश्यों में अक्सर दिखने वाले घिसे-पिटे फार्मूलों से जसपाल ने दूरी बनाए रखी है।
फिल्म का क्लाइमेक्स अप्रत्याशित तरीके से कहानी को नई दिशा दे देता है। यह दिलचस्प है। यहां पर जबरन ठूंसा गया कोई आइटम सांग या बेवजह के दृश्य नहीं है। हालांकि, मंजू और शंभुनाथ की नजदीकियां कैसे बढ़ीं? मंजू अपने किसी स्वजन की बात क्यों नहीं करती? इसका स्पष्ट विवरण कहानी में नहीं मिलता। हालांकि ऐसी कुछ छोटी मोटी कमियों को नजरअंदाज किया जा सकता है।
चुटीले संवाद और बेहतरीन कहानी
तकनीकी पक्ष पर नजर डालें तो कास्टिंग डायरेक्टर विकी सदाना की सराहना करनी होगी, जिन्होंने किरदारों के अनुरूप बेहद सटीक कलाकारों का चयन किया है। फिल्म के संवाद कई जगह चुटीले और असरदार बन पड़े हैं, जो कहानी को जीवंतता देते हैं। एडिटर भरत एस. रावत ने संपादन में अच्छा कसाव बनाए रखा है, जिससे कथा की गति बनी रहती है। वहीं सिनेमेटोग्राफर सपन नरूला ने जेल के माहौल और परिवेश को बड़ी बारीकी से कैमरे में उतारा है। अद्वैत नेमलेकर का बैकग्राउंड स्कोर भी फिल्म के भाव और प्रभाव को गहराई देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लंबे समय तक याद रहेंगे फिल्म के किरदार
अभिनय की बात करें तो संजय मिश्रा शंभुनाथ के किरदार में बेहद प्रभावशाली हैं। बेटे की बेरुखी का दर्द, अकेलापन और संवेदनशीलता हर भाव को उन्होंने सहजता से जिया है। नीना गुप्ता ने निर्दोष होकर भी सजा काट रही मंजू की पीड़ा और धैर्य को बेहद स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत किया है। कुमुद मिश्रा जातिवादी सोच वाले जेलर के रूप में सटीक लगे हैं। अक्षय डोगरा क्रूर केशव के रूप में नफरत बटोरने में कामयाब रहते हैं। योगिता बिहानी कैरेक्टर के अनुरूप मासूम लगी हैं।
जांच अधिकारी अतीत की भूमिका में अमित के सिंह भी खासा प्रभाव छोड़ते हैं। उनका किरदार शांत और संयमित है, लेकिन उनकी हल्की-सी कुटिल मुस्कान ही कई अनकहे भाव व्यक्त कर जाती है, जो पात्र को और दिलचस्प बना देती है। शिल्पा शुक्ला भी अपनी छोटी, लेकिन प्रभावी भूमिका में याद रहती हैं। कुल मिलाकर वध 2 सामाजिक यथार्थ, नैतिक द्वंद्व और इंसानी सहनशीलता की सीमाओं को टटोलने वाली एक सशक्त फिल्म है, जो अंत तक दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है।