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माशूका की मौत के बाद बने शायर, बंटवारे का झेला दर्द; सिनेमा को कल्ट गीत देने वाले निदा फाजली की कहानी

Published: Mon, 12 Oct 2026 05:04 PM (IST)Updated: Mon, 12 Oct 2026 09:52 PM (IST)

मशहूर शायर निदा फाजली का जीवन विभाजन के दर्द और कॉलेज के अधूरे प्यार से प्रभावित रहा, जिसने उन्हें शायरी की ओर मोड़ा।

मशहूर शायर निदा फाजली

मशहूर शायर निदा फाजली

HighLights

  1. विभाजन के बाद भारत में रहने का फैसला किया

  2. कॉलेज में प्रेमिका के निधन के बाद शायरी शुरू की

  3. बॉलीवुड को दिए कई शानदार गीत

एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। "कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीन कहीं आसमां नहीं मिलता" ये लाइनें हैं मशहूर शायर निदा फाजली (Nida Fazli) की। दिल के गहरे खालीपन को उन्होंने बेहद करीब से महसूस किया और बॉलीवुड को भी कई शानदार गाने दिए।

एक ऐसे शायर जिसने 'इश्क' को इश्क की तरह नहीं देखा बल्कि उसमें तनहाई देखी, रिश्ते देखे, इंसान देखा और पूरी जिंदगी देखी। आज उनकी जयंती के मौके पर हम याद कर रहे हैं निदा फाजली को जिनके जाने के बाद भी उनके लफ्ज हमारे बीच हमेशा महसूस होते हैं।

ग्वालियर से की थी पढ़ाई

प्रसिद्ध शायर और गीतकार निदा फाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था। उनका असली नाम मुक़्तदा हसन निदा फाजली था। उनका बचपन और शुरुआती पढ़ाई ग्वालियर में हुई थी। उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से हिंदी और उर्दू में एम.ए. किया।

Nida (1)

हालांकि विभाजन के समय निदा फाजली के पिता और पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया, लेकिन निदा फाजली ने भारत में ही रहने का फैसला किया। लेकिन परिवार से अलग होने का दर्द उन्हें हमेशा से ही सताता रहा। एक्टर उस समय खुद को काफी अकेला महसूस करते थे और यही उनके जीवन का सबसे बड़ा दर्द बन गया। बाद में यही उनकी शायरी की ताकत बना।

कॉलेज में हुआ था प्यार

इस शायर की लव स्टोरी भी उतनी ही रोमांटिक और दुखभरी है जितना की उनकी गजलें। जब निदा फाजली ग्वालियर में कॉलेज में पढ़ते थे, तब उन्हें अपनी ही क्लास में पढ़ने वाली एक लड़की से धीरे-धीरे गहरा लगाव हो गया। लेकिन वे कभी अपनी इस मोहब्बत का इजहार नहीं कर पाए।

गम भुलाने के लिए लिखते थे शायरी

एक दिन जब वे कॉलेज पहुंचे, तो उन्होंने नोटिस बोर्ड पर एक दुखद सूचना पढ़ी कि उनकी प्रेमिका जिनका नाम मिस टंडन था उनका एक दुर्घटना में निधन हो गया। इस खबर ने उनके दिल को पूरी तरह तोड़ दिया।

Nida (2)

इस गहरी त्रासदी और अपनी अधूरी मोहब्बत के गम को भूलने के लिए उन्होंने लिखना शुरू किया। इसी घटना के बाद वे ग्वालियर के मुशायरों में जाने लगे और धीरे-धीरे एक संजीदा शायर के रूप में उनकी पहचान बनने लगी।

इन फिल्मों के लिए लिखे शानदार गाने

साल 1964 में वे मुंबई आ गए। शुरुआती दिनों में जीवनयापन के लिए उन्होंने 'धर्मयुग' और 'ब्लिट्ज' जैसी पत्रिकाओं में लेख लिखे। धीरे-धीरे फिल्मों में उन्हें गीत लिखने का मौका मिला। फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता का प्रसिद्ध गीत 'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता' और फिल्म सरफरोश का 'होश वालों को खबर क्या' उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में से हैं।

एक अनुमान के मुताबिक निदा फाजली ने बॉलीवुड के लिए करीब 350 गाने और गजलें लिखीं जिनमें 'रजिया सुल्तान' और 'सरफरोश' जैसी फिल्मों के साथ-साथ जगजीत सिंह के साथ उनके एल्बम और कई चर्चित टीवी सीरियल्स के गाने शामिल हैं। 'सैलाब', 'नीम का पेड़' और 'ज्योति' जैसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों के टाइटल ट्रैक उन्हीं की देन हैं।

मूवी अवॉर्ड्स से भी किया गया सम्मानित

फिल्म 'सुर' के लिए उन्होंने 'आ भी जा, ऐ सुबह आ भी जा' और 'कभी शाम ढले तो' जैसे गीत लिखे, जिसके लिए उन्हें स्टार स्क्रीन और बॉलीवुड मूवी अवार्ड्स से सम्मानित किया गया। निदा फाजली का 8 फरवरी 2016 को मुंबई में हृदय गति रुकने से निधन हो गया। उनके निधन से हिंदी-उर्दू साहित्य को अपूरणीय क्षति पहुंची, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी उन्हें जीवित रखे हुए हैं। उनके गीतों के बोल आज भी हमें उनके करीब ले जाते हैं।

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