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    'आदिपुरुष गलती थी, उसकी सजा काटी...', प्रभास की फिल्म से Manoj Muntashir को सबक, Ramayana से हैं ये उम्मीदें?

    By Smita SrivastavaEdited By: Rinki Tiwari
    Updated: Sun, 09 Aug 2026 08:39 AM (IST)

    मनोज मुंतशिर (Manoj Muntashir) ने आदिपुरुष को लेकर मिली आलोचना और पछतावे पर बात की है। साथ ही रणबीर कपूर की रामायण (Ramayana) को लेकर भी रिएक्शन दिया। ...और पढ़ें

    आदिपुरुष और रामायण पर बोले मनोज मुंतशिर। फोटो क्रेडिट- एक्स

    आदिपुरुष और रामायण पर बोले मनोज मुंतशिर। फोटो क्रेडिट- एक्स

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    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। फिल्म ‘साइना’ (2021) के गीत 'मैं परिंदा क्यों बनूं' के लिए सर्वश्रेष्‍ठ गीत का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने के बाद मनोज मुंतशिर को हाल ही में फिल्म ‘मैदान’ (2024) के गाने ‘जाने दो’ गीत के लिए दूसरी बार राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिलेगा।

    हालांकि, फिल्‍म आदिपुरुष के संवादों को लेकर हुई तीखी आलोचना के बाद मनोज का कहना है कि जनता ने उन्‍हें माफ कर दिया है। इन दिनों वह देश के अलग अलग हिस्‍सों में अपने नाटक 'कृष्‍णा : राधा से रणभूमि तक' का मंचन कर रहे हैं। पांच सितंबर को इसका मंचन दिल्‍ली में होगा।

    आपको दोबारा नेशनल अवार्ड मिलने की खबर कैसे पता चली थी?

    वास्‍तव में मैं स्टेज पर था। 'कृष्‍णा : राधा से रणभूमि तक' हमारा नाटक मुंबई में चल रहा था।  नाटक के सेकंड हाफ में जब मैं मंच था, तब मेरी पत्‍नी नीलम मुझे बता रही थी कि दुनिया से मैसेज आ रहा है किसी अवॉर्ड को लेकर। मैंने कहा नेशनल या सरकारी अवॉर्ड को छोड़कर मैं कोई अवॉर्ड नहीं लेता। जैसे ही स्‍टेज से उतरा बधाइयों का ताता लगा हुआ था। बहुत अच्छा लगा। मुझे लेकिन कुछ भी नहीं पता था इस बारे में।

    'तेरी मिट्टी' गाने को अवॉर्ड न मिलने के बाद से आपने अवॉर्ड लेना बंद किया...

    मैं छोटे से गांव का लड़का हूं। हमने सपने देखे थे कि कभी हम भी आइफा या फिल्‍मफेयर के स्‍टेज पर होंगे। मैंने दोनों हाथों से कई बार अवॉर्ड बटोरे हैं लेकिन मैं ये भी जानता था कि ये आपकी काबिलियत का बैरोमीटर नहीं है। यह भी जानता था कि इन अवॉर्ड्स के पीछे भी राजनीति क्या होती है। मैं ये भी जानता था कि ये अवॉर्ड्स बिकाऊ हैं। मैंने कभी नहीं खरीदे लेकिन साल 2019 फिल्मफेयर में मैं पूरी तरह से मोहभंग हो गया।

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    'तेरी मिट्टी' (फिल्‍म केसरी का गाना) फिल्‍ममेयर (Filmfare Awards) में नामांकित था। वो अवॉर्ड समारोह गुवाहाटी में हुआ था। कभी समस्‍या यह नहीं थी कि 'तेरी मिट्टी' (Teri Mitti) के लिए अवॉर्ड नहीं दिया। यह लोग गलत समझते हैं कि इसे अवॉर्ड नहीं मिला तो मैंने गुस्‍से में अवॉर्ड लेना बंद कर दिया। कहानी ये है कि वो मुझको छोड़ के जिस आदमी के साथ गया बराबरी कभी होता तो समझ आ जाता। उस साल नामांकित गाने थे 'तेरी मिट्टी', इरशाद कामिल 'बेख्‍याली' का, अमिताभ भट्टाचार्य का 'कलंक नहीं, इश्क है'... इतने सुंदर गाने और आपको सर्वश्रेष्‍ठ गीत दिखा 'नंगा ही तो आया है'...

    Manoj Muntashir

    तो ये अगर आपकी समझ है तो मैं अपने आपको जज करने का अधिकार आपसे इसी वक्त छीन रहा हूं। मैं आपको इस काबिल नहीं समझता कि आप मुझे जज करें। बस इतनी सी बात है। मैं तालियां बजाता अगर कलंक या बेखयाली को इन्होंने सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार का अवॉर्ड दिया होता। मैं जब किसी मंच पर हूं तो मैं एक परंपरा को रेप्रेजेंट करता हूं। मैं शैलेद्र, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्‍तानपुरी, आनंद बख्‍शी की परंपरा से आता हूं।

    मैं वो सब रेप्रेजेंट कर रहा हूं। तो मुझे लगता है, मैंने सबको बहुत नीचा दिखा दिया। तो मुझे नहीं चाहिए। उसी दिन मैंने जितने भी पुरस्कार थे, उन सभी का त्याग कर दिया। हालांकि उसके बाद भी लोग मुझे बुलाकर यह भी कहते रहे कि आप आइए और पुरस्कार ग्रहण कीजिए। मैंने साफ कह दिया कि अब इसका कोई सवाल ही नहीं है। मैं आपके सम्मानित समाचार पत्र के माध्यम से भी यही बात कहना चाहता हूं कि अगर कोई भविष्‍य में देना चाहता है तो मैं लूंगा नहीं।

    आपने इस अवॉर्ड को रीडेम्प्शन (प्रायश्चित) कहा

    हां। जिसके भाग्‍य में समुद्र लिखा हो उसे एक प्‍याला टूट जाने की शिकायत नहीं करनी चाहिए। जब मैंने कहा कि मैं अवॉर्ड नहीं लूंगा तब तक मुझे नेशनल अवार्ड मिला भी नहीं था। इसलिए प्रायश्चित था यह अवॉर्ड क्‍योंकि हिंदी फिल्मों का छोटा सा पूल है। उस छोटे से पूल में इसको देना है या उसको देना है लेकिन जब आप नेशनल अवॉर्ड मिलता हैं तो उस पर गर्व होता है।

    इतनी भाषाएं, हजारों गीत और उनमें से एक गाने को अवॉर्ड मिल रहा है। मुझे महाराष्ट्र साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया। दोनों अवॉर्ड मैं बड़े गर्व से लोगों को दिखाता हूं। मैं हिंदी फिल्‍मों का चौथा या पांचवां गीतकार हूं जिसे दो बार नेशनल अवॉर्ड मिला है।

    'मैदान' फिल्‍म के गाने से जुड़ी कोई खास याद है?

    अरे बड़ी प्यारी कहानी है। डेढ़ दो साल पहले की बात है, जब फिल्‍म नहीं चली तब एक पार्टी में बोनी कपूर जी (फिल्‍म के निर्माता) से मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे एक बात कही कि, मनोज, कभी दुख मत करना 'मैदान' ना चलने का, वो हमारी 'कागज के फूल' (गुरु दत्त की फिल्म) है। बोनी जी की इस बात ने न मुझे एक मुस्‍कान भी दी और मेरी आंखें भी भर आईं। उन्होंने बड़े जुनून से फिल्‍म बनाई थी। सब कुछ झोंक दिया, सब दांव पर लगा दिया एक फिल्‍म बनाने के लिए।

    पर किसी वजह से फिल्म नहीं पहुंच पाई। तो ये भी एक रीडेम्प्शन रहा कि अब उस फिल्म की उपलब्धियों में एक और पंख जुड़ गया। अब वो राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार की श्रेणी में आ गई। तो व्यक्तिगत उपलब्धि से ज्यादा मुझे लगता है कि मेरी फिल्म की उपलब्धि है। हालांकि, फिल्म में आखिरी गाना है लेकिन जब हमने बनाया था वो मेरा पहला गाना था। तो चेन्नई में ए.आर. रहमान सर का स्‍टूडियो में निर्देशक अमित शर्मा, बोनी जी, रहमान सर और मैं था।

    रहमान सर और मेरी घड़ी कभी मैच नहीं करती क्‍योंकि मैं रात में साढ़े दस बजे सो जाने वाला इंसान हूं। वो देर रात में काम शुरू करते हैं। मुझे पता था कि साढ़े दस के बाद काफी पीकर भी नहीं जाग पाता। अगर मैं जागा भी रहूं तो मेरा दिमाग तो चलेगा नहीं। रहमान सर को यह धुन तीन बजे रात में आई और मैं जागा हुआ था। उन्‍होंने कहा धुन सुनो उसे सुनते ही मेरे सारे दिमाग के जितने तंतु थे वो सब भन-भना के जाग उठे। मैंने मोबाइल पर उनको गाते हुए रिकॉर्ड किया।

    उनके स्‍टूडियो में फर्स्ट फ्लोर पर एक झूला पड़ा हुआ वहां गया। उस धुन पर यह लाइनें आई आवाजों के धागे खोलो और तराने गाने दो... मैदानों में धूल न कम हो... फिर नीचे आया, रहमान सर को सुनाया। सुनते ही उन्‍होंने कहा यह आपका नेशनल अवॉर्ड है। मैं हंसा बड़ी जोर से मैंने कहा, शुक्रिया आपको अच्छा लगा, यही मेरा नेशनल अवॉर्ड है। पता नहीं कौन सी सरस्वती विराज मान थीं कि साल 2024 में मैंने ढेरों फिल्‍मों के गाने लिखे, लेकिन अवॉर्ड इसी गाने के लिए मिलना था। मुझे लगता है रहमान सर की बात पर कही किसी ने तथास्तु बोल दिया।

    फिल्‍म आदिपुरुष की वजह से आपको और आपके परिवार को काफी तनाव से गुजरना पड़ा?

    मुश्किल रहा लेकिन गलती भी मेरी थी। और मैं ही क्‍यों? मैं कह नहीं सकता था क्योंकि अक्सर ऐसा होता है जब आपसे सब कुछ बुरा होता है तो आप अपने परमात्मा से पूछते हो कि मैं क्यों? मैं ऐसा इसलिए नहीं कह सकता था कि गौरगंज के लड़के ने गलियां लिखा और गली गली गाया गया। दुनिया के सारे अवॉर्ड झोली में गिर रहे थे, तब तो मैंने नहीं पूछा मैं क्‍यों।

    Adipurush

    आदिपुरुष गलती थी उस गलती की सजा मिलनी चाहिए थी, मैंने अपने हिस्से की सजा काटी। वो सजा बहुत पीड़ादायक थी। उसने बहुत दुख दिए। पर अपराध भी तो किया था। अपराध का दंड मिलेगा। अब मैं इस बात से खुश हूं कि देश की जनता ने फिर मुझे माफ कर दिया है।

    रणबीर कपूर की रामायणम् से क्‍या उम्‍मीदें हैं?

    मैं चाहूंगा कि लोग देखें। प्रभु श्रीराम की कहानी है जो भी सुनाए जहां से भी आए मेरे हाथ जुड़े हुए हैं।  मेरा रामायणम् से कोई संबंध नहीं है लेकिन हर दिन प्रार्थना करता हूं कि इस फिल्‍म को लोग स्‍वीकार करें। मुझे नहीं पता कि यह फिल्‍म कैसी बनी है। कुछ नहीं जानता फिल्म के बारे में लेकिन क्योंकि हमारे श्रीराम की कहानी है तो लोग देखें।

    आदिपुरुष से क्या सबक मिला?

    जिस फिल्म के मेकिंग पर, मेरा पूरी तरह अख्तियार नहीं होगा, सौ प्रतिशत नियंत्रण उस फिल्‍म के संवाद मैं कभी नहीं लिखूंगा अगर इतिहास की तरफ है तो। अगर काल्‍पनिक कहानी है मुझे कोई समस्‍या नहीं है, मैं लिख दूंगा लेकिन अगर वो कहानी मेरे राम, महादेव या कृष्ण की है। तो उसका क्रिएटिव कंट्रोल मुझे पूरी तरह चाहिए। आदिपुरूष के उस वक्त लगा कि यह भी ठीक है। तो मेरी भूल है मेरा दोष है। उसके बाद मैंने उसको बचाव किया।

    बचाव मैंने सिर्फ दो दिन किया था। लेकिन दो दिन में समझ गया था कि यह बहुत बड़ी गलती हो चुकी है और उन दो दिनों का डिफेंस मुझे आज पिछले तीन साल से डंक मार रहा है। उसकी सजा भी मैंने बहुत भुगती। तो... मैंने सीखा ये कि अगर क्रिएटिव कंट्रोल नहीं है मेरा तो मैं उसके संवाद नहीं लिखूंगा। गाने लिखने में कोई समस्‍या नहीं है, गाने मैं लिखूंगा।

    नाटक कृष्‍णा : राधा से रणभूमि तक कैसे लिखने और बनाने का सोचा?

    मैं बहुत पढ़ने का शौकीन हूं। मुझे पढ़ने का जो शौक है वो पागलपन की हद तक है। मैं बिना खाने पीने के जी सकता हूं, लेकिन मुझे किताबें चाहिए। कुछ साल ऐसे थे जो मैं सिर्फ श्रीराम पढ़ता रहा तो मैंने तकरीबन 25 अलग-अलग रामायण जितना मैं पढ़ पाया अनुवाद कर करके, उड़िया रामायण ये सब मैंने पढ़ी। वो मेरा एक दौर चल रहा था कि मुझे अब राम को समझना है मुझे बड़ा मजा आ रहा था। यही दौर चला मेरा पिछले साल भगवान श्री कृष्ण को लेकर।

    अचानक, मैंने भागवत पुराण पढ़ा उसके मूल स्‍वरूप में। मैंने वेदव्यास जी की महाभारत पढ़ी मैंने हरिवंश पुराण पढ़ा तो मेरी रुचि बढ़ती गई। दिमाग में कुछ लिखने की बात नहीं थी। मैं कभी कुछ भी पढ़ते हुए यह नहीं सोचता कि मुझे इसमें कुछ लिखना है या मुझे इसका कोई फायदा उठाना है वो बात कभी नहीं होती क्योंकि साहित्य को ग्रहण करने का यह सबसे खराब तरीका है। पढ़ने में आनंद आ रहा है तो आ रहा है बस वही सुख है उसका।

    मुझे लगता है भगवान श्री कृष्ण पर करीब 55 किताबें, मेरे किंडल का एक फोल्डर है, इतनी मैंने पढ़ डाली और एक साल मैं दिन रात पढ़ता रहा। अब पढ़ते-पढ़ते आप जाहिर सी बात है लोडेड हो गए आप। मुझे भगवान श्री कृष्ण एक ऐसे दृष्टिकोण से दिखने लगे जो इसके पहले किसी ने नहीं देखा था। मेरे लिए भगवान कृष्ण, मैं सोचता है क्या है एक कहानी की बात है कि हमारे प्रभु जो संपूर्ण भगवान थे। आप देखें तो वो सोलह कलाओं के स्वामी है।

    फिर भी उनसे हर किसी को शिकायत है। राधा रानी की अपनी शिकायत है कि तुम तो मुझे छोड़ के चले गए मेरा क्या दोष था। रुक्मिणी को पूरे जीवन यह शिकायत रही कि तुम तो प्रेमी राधा के रह गए मेरा कृष्ण किधर है? द्रौपदी को यह शिकायत रही कि जब मेरी चीर उतर रही थी तुमने इंतजार क्यों किया? किस बात का इंतजार कर रहे थे। मां यशोदा को शिकायत कि तुमने गोकुल को छोड़ दिया। तो इतने लोगों को शिकायत मेरे भगवान से क्यों है?

    गांधारी को शिकायत कि तुमने मेरे सौ बेटे मरवा दिए। मैं तो शत-पुत्रवती होकर आई थी इस दुनिया में और जब इस दुनिया से जाऊंगी मैं तो मेरी चिता को अग्नि देने वाला कोई नहीं होगा। इन सबके दृष्टिकोण से मैंने भगवान श्री कृष्ण को देखने की कोशिश की और यही एक नए तरह के कहानी कहने के अंदाज को जन्म देता है। अब अगर मैं भगवान श्री कृष्ण की लीलाएं दिखाऊंगा तो किसको नहीं पता है? मेरी जनता तो मुझसे ज्यादा पढ़ी-लिखी है। मैं उन्‍हें हल्‍के में नहीं लेता।

     

     
     
     
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    मुझे पता था कि अपनी जनता को थिएटर में बुला रहा हूं तो मैं इनको मुझे कुछ ऐसा दिखाना पड़ेगा जो इन्होंने नहीं देखा अबतक। मैं भगवान श्रीकृष्ण का नाम लूं तो कंस का वध, गोवर्धन पर्वत उठा लिया सबको पता है मेरे नाटक  में इनसे बचता हुआ निकल गया हूं। मेरे नाटक में आपको एक सेकेंड भी ऐसा कोई क्षण नहीं मिलेगा जो कि आप पहले से अनुमान लगा पाएं। मेरा दृष्टिकोण यही था कि पांच महिलाएं जिनको शिकायत है पूर्ण पुरुष से।

    इनकी शिकायतों से मैं देखता हूं अपने भगवान को। तो बहुत मानवीय दिखते हैं। आज मैं बड़े गर्व से कहता हूं यह नाटक देखने वालों में 35 प्रतिशत जेनजी है। मैं जानता हूं कि जब आप ढाई घंटे गुजार के जाओगे मेरे कृष्ण के साथ तो दो चीजें होंगी। एक तो आप लौट के फिर से आओगे। और दूसरा उसी दिन से आपको कृष्ण में रुचि पैदा हो जाएगी।

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