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    देशभक्ति की थीम, मोहम्मद रफी के सदाबहार गीत... 44 साल पहले Amitabh Bachchan की फिल्म रही थी सरप्राइज हिट

    Updated: Sun, 19 Apr 2026 12:59 PM (IST)

    विविधता में एकता और सांप्रदायिक सद्भाव पर आधारित एक्शन-ड्रामा फिल्म 'देश प्रेमी' (Desh Premee) मनमोहन देसाई और अमिताभ बच्चन की सफल जोड़ी की एक और फिल् ...और पढ़ें

    देशभक्ति पर आधारित थी अमिताभ बच्चन की फिल्म। फोटो क्रेडिट- एक्स

    देशभक्ति पर आधारित थी अमिताभ बच्चन की फिल्म। फोटो क्रेडिट- एक्स

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    अनंत विजय, नई दिल्ली। मनमोहन देसाई हिंदी के ऐसे फिल्मकार के तौर पर याद किए जाते हैं जिनकी फिल्मों में भरपूर मनोरंजन होता था, ह्यूमर होता था। कई बार वो ऐसे दृश्य दिखा देते थे, जो अकल्पनीय होते थे।

    सांप्रदायिक सद्भाव दिखाने के चक्कर में फिल्म 'अमर अकबर एंथनी' (Amar Akbar Anthony) में एक मां को उनके तीन बिछड़े बेटे का खून एक साथ चढ़वा देते हैं। निरूपा राय (भारती) अस्पताल में भर्ती हैं और उनको खून की आवश्यकता है। अस्पताल में एक बेड पर वो लेटी होती हैं तीन अन्य बेड पर विनोद खन्ना (अमर), ऋषि कपूर (अकबर) और अमिताभ बच्चन (एंथनी)।

    इमोशन दिखाने के लिए गढ़ा था सीन

    तीनों के हाथ से तीन अलग-अलग इंट्रावेनस ट्यूब से खून निकालकर एक बोतल में ले जाया जाता है। उस बोतल से एक अलग ट्यूब से निरुपा राय को खून चढ़ाया जाता है। वो ठीक होने लगती हैं और फिल्म के दर्शक मारे खुशी के उछलने लगते हैं। अब इसमें लॉजिक नहीं खोजा जाता है। इस तरह के कारनामे मनमोहन देसाई ने कई फिल्मों में किए। उनसे जब पूछा जाता था तो वो कहते थे कि संदेश देने के लिए ऐसे दृश्यों का सृजन करना पड़ता है। जनता को समझने में आसानी होती है।

    साउथ में सुपरहिट रही थी 'देश प्रेमी'

    उनकी फिल्म 'देश प्रेमी' सबसे संतुलित और कठोर संदेश देने वाली फिल्म है। आज से करीब 44 वर्ष पहले जब ये फिल्म रिलीज हुई थी तो अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी, लेकिन इसे दक्षिण भारत में बहुत पसंद किया गया था। मनमोहन देसाई ने अपनी इस फिल्म में बेहद प्रभावशाली दृश्यों और संवादों के माध्यम से संदेश दिया था।

    Desh Premee movie

    अमिताभ बच्चन का था डबल रोल

    अमिताभ बच्चन इसमें डबल रोल में थे। स्वतंत्रता सेनानी मास्टर दीनानाथ और उनके बेटे राजू की भूमिका में। मास्टर दीनानाथ को ठाकुर प्रताप सिंह (अमजद खान) के काले कारनामों का पता चलता है और वो उसे उजागर करना चाहते हैं। ठाकुर मास्टर जी को प्रलोभन देकर रोकना चाहता है। अनिर्णय की स्थिति में मास्टर जी रातभर सो नहीं पाते हैं।

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    देशभक्ति दिखाने का अलग तरीका

    इस किरदार के द्वंद्व को दिखाने के लिए फिल्मकार ने दृश्य रचा। दीनानाथ कमरे में बैठे सोच रहे होते हैं कि क्या करें तो उनकी निगाह स्वाधीनता सेनानी के उनके मेडल पर जाती है। वो चांद की रोशनी में चमक रहा होता है। दीनानाथ सोचते हैं कि देशभक्ति सिर्फ युद्ध के समय वीरता दिखाना ही नहीं, बल्कि शांति के समय ईमानदारी से समाजसेवा करना भी है।

    ईमानदारी की चुकाई थी कीमत

    वो ठाकुर के काले कारनामों को उजागर कर देते हैं। मास्टर दीनानाथ साहस दिखाते हैं, लेकिन उनको इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उनके घर को आग लगा दी जाती है। उनकी बेटी और पत्नी का अपहरण कर लिया जाता है। प्रचारित कर दिया जाता है कि दोनों मर गईं। मास्टर दीनानाथ अपनी जगह छोड़कर एक बड़े स्लम भारत नगर में रहने चले जाते हैं।

    बेटा ही बन जाता है अपराधी

    बेटा उनके साथ होता है। भारत नगर में वो अपनी नैतिकता और ईमानदारी के साथ लोगों के बीच प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। भारत नगर में भी चार छोटे-छोटे अपराधी होते हैं जो मुसलमान, पंजाबी, तमिल और बंगाली होते हैं। ये सभी अपने समुदाय के लोगों की चिंता करते हैं मगर एक भारतीय की तरह नहीं सोचते। मास्टर जी सबको एक करने का प्रयास करते हैं। समय ठीक गुजरने लगता है और अतीत की यादें धुंधली पड़ने लगती हैं। इस बीच मास्टर जी का बेटा राजू खुद अपराधी बन जाता है।

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    Desh Premee

    देश के लिए संपूर्ण समय लगा देने वाले मास्टर जी को पता ही नहीं चलता है कि उनका बेटा ठाकुर के लिए काम करने लगा है। एक समय ऐसा आता है जब ठाकुर उनके बेटे पर गोली चलाता है और उसकी जान बचाने के लिए मास्टर जी उसके सामने आ जाते हैं।

    फिल्म के जरिए डायरेक्टर ने दिया संदेश

    फिल्मकार ने चतुराई से कई संदेश दे दिए। मास्टर दीनानाथ मरने के पहले बेटे से कहते हैं- तुम्हारी मां कोढ़ से मर गई, मगर भारतमाता को कोढ़ मत होने देना। इसके सीने पर कोढ़ फैलाने वाले वतनफरोशों को खतम कर देना, खतम कर देना। फिल्मकार यहां कोढ़ को मेटाफर की तरह पेश करते हैं। संदेश देते हैं कि भ्रष्टाचार समाज और देश के लिए कोढ़ है।

    मास्टर जी जब अंतिम सांस लेते हैं और उनके मुंह से 'हे राम!' निकलता है तो राजू जोर से चिल्लाता है- 'पिताजी।' इस चीख के साथ एक नवजात के रोने की आवाज आती है। मास्टर जी के घर तीसरी पीढ़ी का आगमन होता है। सनातन के अनुसार जीवन की निरंतरता का संदेश।

    ये ऐसी फिल्म थी, जिसने दर्शकों का मनोरंजन तो किया, लेकिन देशप्रेम के हैवी डोज के साथ। आज जब देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना चुका है, तब भी इस फिल्म से निकलते संदेश हमें सोचने पर तो मजबूर करते ही हैं!

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