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'6 महीने की मोहलत नहीं मिलेगी', अरावली पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; हाई-पावर्ड कमेटी को दिया 30 नवंबर तक का अल्टीमेटम

By Aditya RajEdited By: Deepti Mishra
Published: Mon, 07 Sep 2026 06:35 PM (IST)Updated: Mon, 07 Sep 2026 06:44 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली मामले में हाई-पावर्ड कमेटी को रिपोर्ट दाखिल करने के लिए 6 महीने की अतिरिक्त मोहलत देने ...और पढ़ें

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HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने अरावली रिपोर्ट के लिए मोहलत देने से मना किया।

  2. हाई-पावर्ड कमेटी को 30 नवंबर तक अंतिम रिपोर्ट सौंपने का निर्देश।

  3. समय पर रिपोर्ट न देने पर समिति के पुनर्गठन की चेतावनी।

जागरण संवाददाता, गुरुग्राम। अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और उसके संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हाई-पावर्ड कमेटी को बड़ा झटका देते हुए अंतिम रिपोर्ट के लिए मांगी गई छह माह की अतिरिक्त मोहलत देने से साफ इनकार कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने समिति को 30 नवंबर तक अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि तय समय सीमा में रिपोर्ट नहीं आती है तो समिति का पुनर्गठन किया जा सकता है। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी।

हाई-पावर्ड कमेटी ने कोर्ट में क्‍या कहा?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान समिति की ओर से कहा गया कि अरावली के व्यापक और वैज्ञानिक आकलन के लिए उसे और समय की जरूरत है। समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने की समयसीमा छह माह बढ़ाकर फरवरी 2027 तक करने का अनुरोध किया था। हालांकि, अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

सीजेआई ने कहा

समिति को रिपोर्ट तैयार करने के लिए दिन-रात काम करना चाहिए और यदि दो माह में काम पूरा नहीं होता तो पूरे पैनल का पुनर्गठन किया जाएगा।

कैसे शुरू हुआ था विवाद?

अरावली की परिभाषा को लेकर विवाद पिछले वर्ष नवंबर में उस समय गहरा गया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति की सिफारिश के आधार पर अरावली पहाड़ियों की पहचान के लिए 100 मीटर ऊंचाई वाले मानक को स्वीकार किया था। फिर पर्यावरण विशेषज्ञों और संगठनों ने आशंका जताई कि इस मानक से अरावली के बड़े हिस्से संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकते हैं।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में अपने ही आदेश को फिलहाल स्थगित करते हुए मामले की व्यापक और स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा का रास्ता खोला। अदालत ने माना था कि अरावली जैसी प्राचीन और पर्यावरणीय रूप से महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला की पहचान केवल एक पैमाने के आधार पर करने से कई महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित रह सकते हैं। इसी उद्देश्य से हाई-पावर्ड कमेटी को अरावली की परिभाषा, संरक्षण, संभावित खनन प्रभाव और पर्यावरणीय निरंतरता समेत व्यापक पहलुओं की समीक्षा का जिम्मा दिया गया।

समिति चाहती है इकोसिस्टम आधारित आकलन

वर्तमान हाई-पावर्ड कमेटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में अरावली को केवल पहाड़ियों या ऊंचाई के आधार पर परिभाषित करने के बजाय इकोसिस्टम आधारित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत बताई है। समिति के अनुसार जंगल, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, जैव विविधता, पारिस्थितिक संपर्क और स्थानीय समुदायों की आजीविका जैसे आपस में जुड़े पहलुओं का अध्ययन आवश्यक है। उसने वैज्ञानिक आंकड़ों के सत्यापन, क्षेत्रीय अध्ययन और विभिन्न हितधारकों से परामर्श के लिए अतिरिक्त समय मांगा था।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 25 मई को गठित हाई-पावर्ड कमेटी को व्यापक अध्ययन के बाद रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था। पांच सदस्यीय समिति में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के महानिदेशक को पदेन अध्यक्ष बनाया गया है। इसमें भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के सेवानिवृत्त निदेशक और पर्यावरण मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव समेत विशेषज्ञ शामिल हैं। समिति को संबंधित राज्यों, पर्यावरणविदों, संरक्षण संगठनों, खनन क्षेत्र, किसानों और स्थानीय समुदायों से सुझाव लेने का भी निर्देश दिया गया था।

अब निगाह 30 नवंबर की रिपोर्ट पर

सुप्रीम कोर्ट के सोमवार के आदेश के बाद समिति के सामने अब सीमित समय में अपना वैज्ञानिक आकलन पूरा करने की चुनौती है। अंतिम रिपोर्ट अरावली की सीमा और परिभाषा के साथ-साथ इसके संरक्षण, खनन और भूमि उपयोग से जुड़े भविष्य के फैसलों के लिए महत्वपूर्ण आधार बनेगी। अरावली दिल्ली-एनसीआर समेत हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के बड़े भूभाग के पर्यावरण, जल सुरक्षा और जैव विविधता से जुड़ी है। इसलिए अदालत द्वारा तय 30 नवंबर की समयसीमा पर अब पर्यावरण विशेषज्ञों, राज्यों और स्थानीय समुदायों की नजर रहेगी।