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नारी शक्ति का वैश्विक उभार: एशियाई खेल 2026 में महिलाओं ने तिरंगे के मान और राष्ट्र के लिए लिखी नई गौरव गाथा

Published: Thu, 08 Oct 2026 07:57 PM (GMT+05:30)

भारतीय बेटियों ने आइची-नागोया एशियाई खेल 2026 में 85 पदकों में से आधे से अधिक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया, जो नारी शक्ति के वैश्विक उभार का प्रतीक है।

एशियाई खेल 2026 में भारतीय नारी शक्ति का परचम: पदक और सशक्तिकरण की नई गाथा ( फोटो स्रोत : जागरण )

एशियाई खेल 2026 में भारतीय नारी शक्ति का परचम: पदक और सशक्तिकरण की नई गाथा ( फोटो स्रोत : जागरण )

HighLights

  1. भारतीय बेटियों ने एशियाई खेलों में आधे से अधिक पदक जीते।

  2. नारी शक्ति का उभार समाज में व्यापक परिवर्तन का संकेत है।

  3. खेल प्रणाली में सुधार और जमीनी स्तर पर प्रोत्साहन आवश्यक।

मनु त्या, नई दिल्ली। आइची-नागोया एशियाई खेल 2026 की खेल पट्टी पर जब भारतीय बेटियां पदक तालिका में तिरंगे को सर्वोच्च शिखर की ओर ले जा रही थीं, तब वे केवल पदक नहीं जीत रही थीं, समूचे भारतीय समाज को एक युगांतकारी संदेश दे रही थीं।

जापान के नागोया में भारत द्वारा जीते गए 85 पदकों में से आधे से अधिक पदक महिला एथलीटों के शौर्य, एकाग्रता और पसीने की उपज हैं। भारतीय महिला हाकी टीम द्वारा चीन को एक-शून्य से हराकर 44 वर्षों बाद जीता गया ऐतिहासिक स्वर्ण पदक हो, तीरंदाजी में 17 वर्षीय कुमुद मोहोद का अचूक निशाना हो या गोल्फ में प्रणवी उर्स का ऐतिहासिक स्वर्णिम कीर्तिमान-ये सभी इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि भारत की बेटियां आज किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं।

यह परिवर्तन किसी एक जगह तक सीमित नहीं

21वीं सदी का भारत एक युगांतकारी परिवर्तन का साक्षी बन रहा है। यह परिवर्तन किसी कूटनीतिक गलियारे, राजनीतिक मंच या केवल आर्थिक आंकड़ों की फाइलों तक सीमित नहीं है, इसकी जीवंत गूंज खेल के मैदानों, अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्रों, कारपोरेट जगत और युद्धक विमानों के काकपिट से सुनाई दे रही है।

हाल ही में संपन्न हुए एशियाई खेल 2026 इस बात का साक्षात प्रमाण हैं कि भारत की बेटियां केवल समाज की रूढ़िवादी बेड़ियों को ही नहीं तोड़ रहीं, अपनी प्रतिभा और अदम्य साहस के बल पर वैश्विक पटल पर देश का मस्तक गर्व से ऊंचा कर रही हैं।

नागोया के खेल मैदानों पर जब-जब भारतीय तिरंगा लहराया और राष्ट्रगान की धुन गूंजी, तब-तब उसके पीछे भारतीय नारी शक्ति के पसीने, त्याग और संकल्प की एक लंबी गाथा छिपी थी। परंतु, इस स्वर्णिम सफलता का वास्तविक मूल्यांकन केवल खेल के मैदान की सीमाओं के भीतर नहीं किया जा सके।

व्यापक सामाजिक चेतना की मांग करती सफलता

यह सफलता एक व्यापक सामाजिक चेतना की मांग करती है। जब हम नारी शक्ति के इस वैश्विक उभार को देखते हैं, तो समाज का एक हिस्सा इसे 'स्त्री बनाम पुरुष' के पारंपरिक द्वंद्व या प्रतिद्वंद्विता की दृष्टि से आदतन देखता है। आधुनिक भारत के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि नारी शक्ति पुरुष की कभी प्रतिद्वंद्वी थी ही नहीं, हर धार्मिक ग्रंथ इसका प्रमाण भी है कि नारी तो पुरुष की सहचरी और पूरक है।

समाज रूपी रथ को सुचारू रूप से चलाने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों पहियों का एक समान गति, गरिमा और गौरव के साथ चलना अनिवार्य है।

समाधान और आगे की राह: सह-अस्तित्व की नई परिभाषा :

भेदभाव से मुक्त और पूरकता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए हमें बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। लैंगिक समानता की शुरुआत संसद या खेल के मैदानों से नहीं, घर के ड्राइंग रूम और रसोई से होनी चाहिए। बेटों को बचपन से ही यह सिखाना होगा कि बहन या महिला मित्र उनकी प्रतिद्वंद्वी नहीं, उनके सुख-दुख की सहयात्री और पूरक हैं।

इसके साथ ही, कार्यस्थलों और खेल अकादमियों में महिलाओं के लिए पूर्णतः सुरक्षित और संवेदनशील माहौल तैयार करना राज्य और समाज दोनों का प्राथमिक दायित्व है। सरकार की 'खेलो इंडिया' और महिलाओं को उद्यमिता के लिए दी जाने वाली प्रोत्साहन योजनाओं जैसी पहलों को और अधिक विस्तार देना होगा ताकि ग्रामीण अंचल की प्रतिभाएं बिना किसी वित्तीय और सामाजिक बाधा के अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर सकें।

इस वैचारिक परिवर्तन के लिए शिक्षा व्यवस्था में भी आमूलचूल बदलाव की आवश्यकता है। हमारी पाठ्यपुस्तकों में केवल महापुरुषों की ही नहीं, उन वीरांगनाओं और महिला विज्ञानियों की कहानियों को भी प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए जिन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।

अब देश की बेटियां भय में नहीं है 

आइची-नागोया एशियाई खेल में बेटियों का शानदार प्रदर्शन इस बात का उद्घोष है कि भारत की नारी शक्ति अब अपने अधिकारों के लिए याचक नहीं, अपनी योग्यता के बल पर राष्ट्र की नियति की संचालक बन चुकी है। जब देश की बेटियां बिना किसी भय, भेदभाव और हीनभावना के पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर, एक-दूसरे की पूरक बनकर खड़ी होंगी, तभी भारत सही मायनों में 'विश्वगुरु' और एक सशक्त विकसित अर्थव्यवस्था बनने के अपने संकल्प को सिद्ध कर पाएगा।

बेटियों की यह स्वर्णिम उड़ान थमनी नहीं चाहिए, क्योंकि उनकी पूर्णता में ही इस राष्ट्र की पूर्णता और समग्र विकास निहित है। मैदान से लेकर महाआकाश तक बेटियों ने जो मशाल जलाई है, उसकी रोशनी आने वाले ओलिंपिक और हर वैश्विक मंच पर भारत का रास्ता आलोकित करती रहेगी। यह नया भारत अपनी पूरी ताकत से तभी आगे बढ़ेगा जब स्त्री और पुरुष, दोनों मिलकर इस देश के भाग्य का निर्धारण करेंगे।

भारत में खिलाडि़यों का एक सच ये भी है। अक्सर होता है, जब भी हमारे देश का कोई भी खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर पदक जीतता चाहे पुरुष खिलाड़ी हो या महिला। बतौर पत्रकार हम सबसे पहले उसके संघर्ष से जुड़ी कुछ प्रेरक कहानी ही तलाशते हैं। मतलब हम इस बात से बखूबी अवगत होते हैं कि खेलों से जुड़ी तमाम राष्ट्रीय योजनाओं के बावजूद भी हमारी खेल व्यवस्था ऐसी ही है कि खेल प्रतिभा को हमारा खेल जगत का सिस्टम तलाशकर अवसर नहीं दे पा रहा।

खुद को साबित करना होता है

ये प्रतिभाएं जिद्दोजहद करके ही पदकों तक तक पहुंच रही हैं। इसीलिए आज भी किसी खिलाड़ी के घरवाले गाय-बैल बेच रहे हैं, कोई अपनी पुश्तैनी जमीन बेच रहा है, तो कोई पैसे उधार ले रहा है, ताकि उनके बच्चे खेलों में बने रहें। महिला खिलाड़ियों के लिए खेलों की डगर और भी कठिन है, क्योंकि उन्हें मैदान में खुदको साबित करने के साथ-साथ सामाजिक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है।

वेटलिफ्टर मीराबाई चानू, आज बहुत बड़ी स्टार खिलाड़ी हैं, लेकिन शुरुआती दौर में उनके लिए भी खेल में बने रहना बड़ी चुनौती थी। नागोया में मीराबाई ने वह पदक भी हासिल किया, जिसकी कमी उन्हें बहुत अखरती थी। चानू नोंगपोक काकचिंग गांव में उनका घर राजधानी इंफ़ाल से करीब 20 किलोमीटर दूर है। उनके पिता साइखोम करीति एक सरकारी विभाग में श्रमिक थे, घर का खर्च चलाने में हाथ बंटाने के लिए उनकी मां तोम्बी देवी चाय की दुकान चलाती थीं।

बाक्सर मैरी काम की तरह मीराबाई भी अपनी मां की मदद करने के लिए जंगल से लकड़ियां बटोरती थीं, ताकि उन्हें चूल्हे में जलाकर तेल के कुछ पैसे बचाए जा सकें। कबड्डी में भारत को गोल्ड मेडल दिलाने में निकिता की बहुत बड़ी भूमिका रही। हिसार जिले के हसनगढ़ गांव की रहने वाली निकिता के पिता अनिल नयन एक साधारण किसान हैं और उनकी मां विनोद कुमारी घर संभालती हैं।

आर्थिक तंगी के बावजूद उनके माता-पिता ने उन्हें यह सहारा दिया। जिस हरियाणा से आज देश में सबसे अधिक बेटियां खेल जगत में आगे आ रही हैं। सरकार भी खूब प्रोत्साहित कर रही है वहां भी वैश्विक पटल तक पहुंचने वाली हर खिलाड़ी की ऐसी ही कहानी है, जिससे अन्य प्रदेशों की िस्थति भी स्वत: स्पष्ट होती है।

दूसरा पहलू : अपेक्षाओं का भारीपन और पोडियम का सच 

इस बार एशियाई खेल 2026 के समापन के साथ ही भारतीय खेल जगत एक बार फिर आत्ममंथन के मोड़ पर है। इस महाकुंभ में भारत की बेटियों ने जिस असाधारण जज्बे और प्रतिबद्धता का परिचय दिया, वह निसंदेह पूरे देश को गौरवान्वित करने वाला है।

पिछले एशियाई खेल रिकार्ड की तुलना में इस बार भारत की झोली में कुल 85 पदक आए हैं, जिनमें 21 स्वर्ण पदक शामिल हैं। यद्यपि पिछले खेलों के 106 पदकों के ऐतिहासिक शिखर की तुलना में यह संख्या कम हुई है, परंतु कुल स्वर्ण पदकों में से 50 फीसद से अधिक हिस्सेदारी अकेले महिला खिलाड़ियों की है।

इस गौरवशाली सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है, जो खेल प्रशासकों और नीति-निर्माताओं को गंभीर चुनौती दे रहा है। आज भारत का खेल बजट अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर है, 'टाप्स' यानी टारगेट ओलिंपिक पोडियम स्कीम जैसी महत्त्वाकांक्षी योजनाएं सीधे खिलाड़ियों के खातों और विदेशी प्रशिक्षण पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं और खेल विज्ञान का एक व्यापक सहयोगी स्टाफ (मनोवैज्ञानिक, फिजियोलाजिस्ट, न्यूट्रिशनिस्ट) हर दल के साथ साए की तरह चल रहा है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जितना भारी बजट और विश्वस्तरीय सुविधाएं देश के खिलाड़ियों को मुहैया कराई जा रही हैं, उसके अनुपात में पदकों की कुल संख्या और उनकी चमक (विशेषकर स्वर्ण पदक) में अपेक्षित गुणात्मक उछाल क्यों नहीं आ पा रहा है? आखिर वह कौन सी बुनियादी कमियां हैं जो हमें पोडियम की सबसे ऊंची सीढ़ी तक पहुंचने से रोक रही हैं?

हमारी तालिका दो तीन खेलों पर ही टिकी रही

वस्तुनिष्ठ और पुष्ट तथ्यों के आधार पर इसका गहराई से विश्लेषण करना अब अनिवार्य हो चुका है। भारतीय खेल तंत्र की सबसे बड़ी रणनीतिक विफलता यह रही है कि हमारी पदक तालिका ऐतिहासिक रूप से केवल दो या तीन खेलों पर टिकी रही है : शूटिंग, एथलेटिक्स और कुश्ती। जब भी इन मुख्य खेलों में से किसी एक का प्रदर्शन थोड़ा भी डगमगाता है, पूरी राष्ट्रीय पदक तालिका धराशायी हो जाती है।

हांगझाऊ (2023) में भारत को अकेले शूटिंग से सात और एथलेटिक्स से छह स्वर्ण मिले थे। लेकिन नागोया (2026) में शूटिंग का स्वर्ण ग्राफ सिमटकर तीन पर आ गया और 75 से अधिक सदस्यों वाले विशाल एथलेटिक्स दल के बावजूद ट्रैक एंड फील्ड में भारत को केवल एक स्वर्ण पदक (9 रजत, 14 कांस्य के साथ) से संतोष करना पड़ा।

इसके विपरीत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे खेल महाशक्तियां तैराकी, जिम्नास्टिक, डाइविंग, टेबल टेनिस और साइकिलिंग खेलों में हमेशा ही अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित रखते हैं। भारत जब तक इन बहु-पदक वाली स्पर्धाओं में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज नहीं कराता, तब तक बजट का बड़ा हिस्सा सिर्फ कुछ चुनिंदा खेलों की सीमित प्रतिभाओं को चमकाने में ही खर्च होता रहेगा।

अत्याधिक दबाव में मानसिक दृढ़तना बनाना होगा

वरिष्ठ खेल विश्लेषक भी मानते हैं कि आज भारतीय एथलीटों के पास सुविधाओं की कोई कमी नहीं है, कमी है तो अत्यधिक दबाव के क्षणों में मानसिक दृढ़ता बनाए रखने की है। नागोया के आंकड़े खुद गवाह हैं कि भारतीय खिलाड़ी सेमीफाइनल या फाइनल के अंतिम दौर में पहुंचकर मानसिक दबाव में रहे। बैडमिंटन में सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी जैसी विश्वस्तरीय जोड़ी से लेकर पीवी सिंधु और लक्ष्य सेन तक, अपेक्षित क्षणों में पदक की दौड़ से बाहर हो गए।

खेल विज्ञान और मनोवैज्ञानिकों की भारी-भरकम फौज रखने के बावजूद मैदान पर खिलाड़ियों का 'नर्वस ब्रेकडाउन' यह दर्शाता है कि हमारी मानसिक अनुकूलन प्रणालियां अभी भी सतही स्तर पर काम कर रही हैं। करोड़ों रुपये के बजटीय आवंटन के बावजूद भारतीय खेल महासंघों की आंतरिक कार्यप्रणाली आज भी नौकरशाही के पुराने ढर्रे से मुक्त नहीं हो पाई है।

राष्ट्रीय शिविरों के आयोजन में देरी, चयन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी और जमीनी स्तर पर प्रतिभा खोज के दावों की हकीकत? इस पर सवाल खड़े करती है। उद्धरण स्वरूप यदि किसी खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट से ठीक दो महीने पहले विदेशी कोच या अत्याधुनिक उपकरण मिलते हैं, तो वह तात्कालिक प्रदर्शन तो सुधार सकता है, लेकिन दशकों की व्यवस्थित तैयारी वाले प्रतिद्वंद्वियों को नहीं हरा सकता।

भारत में खेल बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल उन चुनिंदा 400-500 एथलीटों पर केंद्रित कर दिया जाता है, जो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो चुके हैं। यह नीति तात्कालिक रूप से कुछ पदक तो दिला सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से एक मजबूत खिलाड़ी तैयार करने में विफल रहती है। जब तक कोई खिलाड़ी एलीट श्रेणी में नहीं आता, तब तक ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में उसे बुनियादी ट्रैक, सही पोषण और स्थानीय स्तर पर योग्य कोच तक नहीं मिलते।

खेल अकादमियां और 'खेलो इंडिया' जैसी पहलें सराहनीय हैं, लेकिन राज्यों के स्तर पर बुनियादी खेल ढांचे का असमान वितरण आज भी एक कड़वी सच्चाई है। नतीजतन, राष्ट्रीय स्तर पर एक ही खिलाड़ी के विकल्प के रूप में दूसरा विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार नहीं मिल पाता।

समय आ गया है कि खेल बजट के पाई-पाई के खर्च की जवाबदेही तय की जाए, ताकि निवेश किए गए जनधन का वास्तविक परिणाम देश के गौरव को पदक तालिका में शीर्ष देशों के समकक्ष स्थापित करके मिल सके।