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    थैलेसीमिया मरीजों के लिए संजीवनी: बार-बार खून चढ़ाने के झंझट से मिलेगी मुक्ति, 'हाफ-मैच बोन मैरो ट्रांसप्लांट' बना नई उम्मीद

    Updated: Fri, 08 May 2026 02:49 AM (IST)

    हाफ-मैच बोन मैरो ट्रांसप्लांट थैलेसीमिया के गंभीर मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरा है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें पूरी तरह से मैच करने वाला डोन ...और पढ़ें

    हाफ-मैच बोन मैरो ट्रांसप्लांट थैलेसीमिया के गंभीर मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरा है। इमेज एआई

    हाफ-मैच बोन मैरो ट्रांसप्लांट थैलेसीमिया के गंभीर मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरा है। इमेज एआई

    अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। थैलेसीमिया जैसे गंभीर रक्त रोग से जूझ रहे बच्चों के लिए हाफ-मैच बोन मैरो ट्रांसप्लांट नई उम्मीद बनकर उभर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन पर निर्भर मरीजों के लिए यह उपचार बीमारी से स्थायी राहत देने वाला विकल्प साबित हो रहा है। हाफ-मैच बोन मैरो ट्रांसप्लांट ने उन मरीजों की उम्मीद बढ़ाई है, जिन्हें पूरी तरह मैच करने वाला डोनर नहीं मिल पाता।

    केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार वर्तमान में देश में छह हजार से अधिक थैलेसीमिया के मरीज हैं, वर्ष 2025 में थैलेसीमिया के पंजीकृत मरीजों की संख्या 4,361 थी। जिनमें 2,579 बच्चे 12 वर्ष से कम आयु के हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है, क्योंकि बड़ी संख्या में मरीज अब भी स्क्रीनिंग और रजिस्ट्रेशन व्यवस्था से बाहर हैं।

    दिल्ली में थैलेसीमिया मरीजों की कोई एकीकृत आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है, लेकिन दिल्ली सरकार और विभिन्न अस्पतालों के आंकड़ों के अनुसार राजधानी में चार हजार के करीब मरीज नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन पर निर्भर हैं। अकेले दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल के ब्लड बैंक में करीब 380 थैलेसीमिया मरीज पंजीकृत हैं।

    इंडियन सोसायटी फार ब्लड एंड मैरो ट्रांसप्लांटेशन (आइएसबीएमटी) के अनुसार देशभर में हर साल करीब 40 हजार मरीजों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। दिल्ली में करीब 3,200 मरीजों को प्रतिवर्ष इसकी आवश्यकता होती है, जबकि यहां हर साल लगभग 1,200 बोन मैरो ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं।

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    देशभर में 100 से अधिक बोन मैरो ट्रांसप्लांट केंद्र कार्यरत हैं, जहां हर साल हजारों ट्रांसप्लांट किए जाते हैं। एम्स, राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट, मैक्स, अपोलो, टाटा मेमोरियल, सीएमसी वेल्लोर और कई सरकारी व निजी अस्पताल इस उपचार की सुविधा दे रहे हैं।

    क्या होता है हाफ-मैच बोन मैरो ट्रांसप्लांट

    हाफ-मैच बोन मैरो ट्रांसप्लांट में 50 प्रतिशत एचएलए-मैच वाले परिजन से स्टेम सेल देकर मरीज का इलाज किया जाता है।

    क्या होता है बोन मैरो

    बोन मैरो हड्डियों के भीतर मौजूद नरम भाग होता है, जहां रक्त बनाने वाली स्टेम सेल्स बनती हैं।

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