बाहर चमचमाती बिल्डिंग, अंदर ठुंसे दर्जनों छात्र; फर्जीवाड़े की नींव पर टिका दिल्ली-NCR में PG का काला कारोबार
दिल्ली-एनसीआर में पीजी का अवैध कारोबार एक बड़ी समानांतर अर्थव्यवस्था बन चुका है, जो सिस्टम की खामियों और मिलीभगत पर ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।
HighLights
दिल्ली-एनसीआर में पीजी अवैध समानांतर अर्थव्यवस्था का हिस्सा।
फर्जी रेंट एग्रीमेंट, बिजली चोरी और टैक्स से बचाव।
सरकारी विभागों की मिलीभगत से चल रहा यह कारोबार।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में पीजी (पेइंग गेस्ट) का कारोबार बहुत बड़ी पैरेलल इकानमी (समानांतर अर्थव्यवस्था) बन चुका है। यह ''नंबर दो'' का बड़ा खेल मुख्य रूप से सिस्टम की कुछ गहरी खामियों और मिलीभगत पर टिका है।
सरकारी विभागों को चकमा देने के लिए पीजी संचालक कई तरह का फर्जीवाड़ा करते हैं। अधिकतर पीजी, नेताओं व बड़े अधिकारियों के होने के कारण पीजी संचालकों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं की जाती है।
अधिकतर पीजी बाहर से देखने पर चार मंजिला चमचमाती बिल्डिंग दिखता है लेकिन अंदर छोटे-छोटे कमरे होते हैं, हर कमरे में तीन-चार लड़के-लड़कियां होती हैं। किराया आठ हजार से 15 हजार तक प्रति बेड होता है।
मुखर्जी नगर, लक्ष्मी नगर, राजेंद्र नगर, बेर सराय, कटवारिया सराय, सत्य निकेतन, विवेक विहार, हौजखास, माडल टाउन में ये कहानी हर गली की है। एमसीडी के नक्शे में यह दो से चार मंजिला मकान हाेते हैं, जिसमें एक परिवार का रहना दिखाया जाता है। लेकिन सही मायने में यह पांच मंजिला होता है।
पार्किंग की जगह पर किचन, बालकनी को तोड़कर कमरा, और छत पर टीन शेड डालकर अतिरिक्त कमरे बने होते हैं। इनके पास न फायर एनओसी, न बिल्डिंग स्ट्रक्चर सर्टिफिकेट होते हैं। इसमें एक घर का घरेलू बिजली कनेक्शन होता है।
बिल तीन चार हजार का आता है लेकिन इस्तेमाल 30 लोगों का एसी, गीजर, इंडक्शन चलता है। मीटर पर लोड होता दो केवी का चल रहा होता है 15 केवी। यानी ये लोग बिजली की चोरी भी करते हैं।
एक मीडियम पीजी में मान लीजिए 25 कमरे हैं, किराया औसत 10 हजार रुपये पर बेड और दो लोग एक कमरे में। यानी एक महीने का कलेक्शन पांच लाख रुपये महीना और साल का 60 लाख होता है। दिल्ली में तकरीबन 40 से 50 हजार पीजी हैं।
आयकर विभाग और एजेंसियों की नजर से कैसे बचता है यह कारोबार?
रेंट एग्रीमेंट का फर्जीवाड़ा
पीजी मालिक अक्सर छात्रों के साथ कोई लिखित रेंट एग्रीमेंट नहीं करते। अगर करते भी हैं, तो कागजों पर किराया पांच से 10 हजार रुपये (आयकर सीमा से नीचे) दिखाते हैं, जबकि बाकी की रकम सुविधाओं (खाना, एसी, वाई-फाई) के नाम पर नकद वसूली जाती है।
अकाउंट्स का विकेंद्रीकरण
अगर आनलाइन पेमेंट लिया भी जाता है, तो वह किसी एक व्यवसायिक खाते में नहीं जाता। पैसा कर्मचारियों, केयरटेकर या रिश्तेदारों के अलग-अलग बचत खातों में मंगाया जाता है ताकि कोई भी खाता आयकर विभाग के रडार या एआइ मानिटरिंग में फ्लैग न हो।
डिजिटल फुटप्रिंट का अभाव
यह पूरा कैश सीधे तौर पर प्रापर्टी खरीदने, सोने में निवेश या अनौपचारिक लेनदेन में खप जाता है। बैंक में पैसा जमा न होने के कारण इसका कोई डिजिटल फुटप्रिंट नहीं बनता।
सरकारी कामकाज और स्थानीय प्रशासन में कहां है गड़बड़ी?
रिहायशी संपत्ति का व्यावसायिक इस्तेमाल: मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर, लक्ष्मी नगर जैसे इलाकों में रिहायशी मकानों को अवैध रूप से हास्टल में बदल दिया गया है। एमसीडी और स्थानीय पुलिस की जानकारी के बिना यह संभव नहीं है। हाउस टैक्स रिहायशी दर से दिया जाता है, जबकि कमाई व्यावसायिक हो रही है।
''बीट'' सिस्टम और स्थानीय सेटिंग
हर इलाके के पुलिस बीट स्टाफ और एमसीडी के जूनियर इंजीनियर को पता होता है कि किस बिल्डिंग में कितने कमरे हैं और कितने छात्र रह रहे हैं। बिना फायर एनओसी और बिल्डिंग बायलाज की अनदेखी कर चल रहे इन पीजी से हर महीने एक मोटी रकम ''सुविधा शुल्क'' के रूप में नीचे से ऊपर तक जाती है।
कोई रेगुलेटरी बाडी नहीं
पीजी कारोबार पूरी तरह से असंगठित क्षेत्र है। इसके लिए कोई सेंट्रलाइज्ड पोर्टल या सख्त रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया नहीं है।
जीएसटी की चोरी
छात्रों से खाने, बिजली, लांड्री और इंटरनेट का पैसा लिया जा रहा है, लेकिन किसी भी सर्विस पर सरकार को जीएसटी नहीं जा रहा।
छात्रों की मजबूरी
छात्र और उनके परिवार शिकायत नहीं करते क्योंकि पुलिस-प्रशासनिक झमेले से वे बचना चाहते हैं और उन्हें रहने के लिए सस्ती जगह चाहिए।
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