कागजों में मास्टर, क्लास से गायब: दिल्ली के टीचर सालों से कर रहे बाबूगिरी, खाली हुए क्लासरूम
दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में शिक्षक स्टाफ रजिस्टर में दर्ज होने के बावजूद जिला और मुख्यालय कार्यालयों में प्रशासनिक कार्य कर रहे हैं। ...और पढ़ें
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सांकेतिक तस्वीर। सौजन्य- AI Generated
HighLights
शिक्षक स्कूलों में दर्ज, पर कार्यालयों में प्रशासनिक कार्य।
वास्तविक शिक्षक कमी से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
शिक्षक संघ ने अलग प्रशासनिक स्टाफ की मांग की।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। राजधानी के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी का एक बड़ा कारण लंबे समय से चल रही प्रशासनिक तैनाती भी बन गई है। बड़ी संख्या में टीजीटी और पीजीटी शिक्षक स्कूलों में नियुक्त होने के बावजूद वर्षों से जिला, जोनल और शिक्षा निदेशालय के मुख्यालय कार्यालयों में प्रशासनिक कार्य कर रहे हैं।
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उनकी उपस्थिति अब भी मूल स्कूलों के स्टाफ रजिस्टर में दर्ज रहती है, जबकि वे नियमित रूप से कक्षाओं में पढ़ाने नहीं जाते। इससे स्कूलों में वास्तविक शिक्षक संख्या सरकारी रिकार्ड से काफी कम हो गई है और पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
स्कूल प्रधानाचार्यों और शिक्षक संगठनों का कहना है कि कई शिक्षक वर्षों से कोर्ट केस, आरटीआइ, आरटीई, फाइलों और अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगे हुए हैं। कुछ मामलों में खेल शिक्षक स्टेडियमों में, जबकि कंप्यूटर साइंस शिक्षक मुख्यालय में तैनात हैं। कई प्रधानाचार्य और उप-प्रधानाचार्य भी जिला कार्यालयों में कार्यरत हैं, लेकिन उनके पद स्कूलों में ही दिखाए जाते हैं। इससे न तो पद रिक्त घोषित होते हैं और न ही उनकी जगह नए शिक्षकों की नियुक्ति हो पाती है।
स्कूल प्रधानाचार्यों का कहना है कि कागजों पर पर्याप्त शिक्षक होने के बावजूद वास्तविकता में कक्षाओं के लिए शिक्षक कम पड़ जाते हैं। सीमित स्टाफ वाले स्कूलों में शिक्षकों पर अतिरिक्त कार्यभार बढ़ जाता है और विषयवार पढ़ाई भी प्रभावित होती है। नेतृत्व स्तर पर भी कई स्कूलों में प्रधानाचार्य और उप-प्रधानाचार्य की अनुपस्थिति से प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
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सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि शिक्षा विभाग में अलग प्रशासनिक कैडर नहीं होने के कारण शिक्षकों को इन जिम्मेदारियों में लगाया जाता है। अधिकारियों का दावा है कि करीब 200 शिक्षकों को ही ऐसी ड्यूटी पर लगाया गया है और इनमें से सभी स्थायी रूप से स्कूलों से अलग नहीं हैं। कई मामलों में उन्हें विभागीय आवश्यकताओं के तहत सीमित अवधि के लिए तैनात किया जाता है। हालांकि, राजकीय विद्यालय शिक्षक संघ का कहना है कि यह समस्या वर्षों से बनी हुई है।
शिक्षक संघ के महासचिव अजय वीर यादव का कहना है कि शिक्षक का पद उसी स्कूल में होना चाहिए जहां विद्यार्थियों को उसकी आवश्यकता है। यदि मुख्यालय, पुस्तकालय, स्टेडियम या अन्य कार्यालयों के लिए कर्मचारियों की जरूरत है तो विभाग को अलग प्रशासनिक स्टाफ की भर्ती करनी चाहिए, न कि शिक्षकों को लंबे समय तक कक्षाओं से दूर रखना चाहिए।
शिक्षा विशेषज्ञों का भी कहना है कि स्कूलों से शिक्षकों की लंबी तैनाती के कारण बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ रहा है। उनका मानना है कि वास्तविक उपलब्ध शिक्षकों का आंकड़ा सार्वजनिक होना चाहिए ताकि खाली पदों पर समय रहते भर्ती की जा सके और सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाया जा सके।