10 लाख की मशीन खरीदी 33 लाख में, दिल्ली के 650 करोड़ दवा घोटाले में 100 करोड़ का खेल बेनकाब
दिल्ली सरकार के 650 करोड़ रुपये के दवा घोटाले में पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों की खरीद में 100 करोड़ रुपये का ...और पढ़ें

जांच में पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों की खरीद सबसे बड़े वित्तीय विवाद के रूप में सामने आई है। एआई इमेज
HighLights
10 लाख की एक्स-रे मशीन 33 लाख में खरीदी गई।
बिचौलिया फर्म एफ-मेड डिवाइसेज के माध्यम से खरीद हुई।
दिल्ली सरकार को 100 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ।
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। दिल्ली सरकार के 650 करोड़ रुपये के दवा एवं उपकरण खरीद घोटाले की चल रही स्टाॅक ऑडिट जांच में पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों की खरीद सबसे बड़े वित्तीय विवाद के रूप में सामने आई है।
स्टाॅक ऑडिट के अनुसार, जिस माॅडल की पोर्टेबल एक्स-रे मशीन निर्माता कंपनी प्रोग्नोसिस मेडिकल सिस्टम्स अन्य सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को लगभग 10 लाख रुपये प्रति मशीन की दर से आपूर्त कर रही थी, वही 448 एक्स-रे मशीनें केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) ने निर्माता से सीधे खरीदने के बजाय एफ-मेड डिवाइसेज बिचौलिया फर्म के माध्यम से करीब 33 लाख रुपये प्रति मशीन की दर से खरीदीं।
स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों से जानकारी के अनुसार, 448 मशीनों की वास्तविक कीमत करीब 45 करोड़ थी, जबकि भुगतान 148 करोड़ का किया गया। इस एक खरीद में ही सरकारी खजाने को 100 करोड़ का चूना लगाया गया और उसे आपस में बांट लिया गया। बताया जा रहा है कि मामले की जांच कर रही एंटी करप्शन ब्रांच (एसीबी) की जांच और एफआइआर में भी इन तथ्यों का उल्लेख किया गया है।
सवाल उठ रहे हैं कि जब पोर्टेबल एक्स-रे मशीन की निर्माता कंपनी उपलब्ध थी तो खरीद सीधे उससे कर दे के बजाय बिचौलिया फर्म से क्यों की गई। इसके लिए दिल्ली की लक्ष्मी नगर स्थित प्रोपराइटरशिप फर्म एफ-मेड डिवाइसेज को आपूर्ति श्रृंखला में क्यों शामिल किया गया। पता लगाया जा रहा हैं कि बिचौलिया फर्म को शामिल करने की आवश्यकता क्या थी और सरकारी खरीद की लागत किसके कहने और इशारे पर तीन गुना से अधिक कैसे पहुंचाई गई।
स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार, स्टाॅक ऑडिट में यह भी सामने आया है कि निविदा की शर्तें इस प्रकार तैयार की गईं थीं कि प्रतिस्पर्धा सीमित हो गई और एफ-मेड डिवाइसेज तकनीकी मूल्यांकन में पात्र घोषित हुई।
इसके बाद आनन-फानन में उसे ऑर्डर देकर आपूर्ति कराई गई और तत्काल भुगतान भी कर दिया गया। अब खरीद प्रस्ताव, तकनीकी मूल्यांकन, मूल्य निर्धारण, भुगतान की मंजूरी, निर्माता और आपूर्तिकर्ता के बीच व्यावसायिक संबंधों तथा पूरी खरीद प्रक्रिया की परत-दर-परत खंगाली जा रही हैं।
मामले से जुड़े अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, जांच का दायरा अब केवल खरीद प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। खरीद से जुड़े निर्णय लेने वाले अधिकारियों की भूमिका, भुगतान की स्वीकृति, आपूर्ति श्रृंखला और संबंधित कंपनियों के बीच संभावित संबंधों की भी पड़ताल की जा रही है।
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