दिल्ली हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे दुष्कर्म के दो दोषियों को समय से पहले किया रिहा
दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के दो दोषियों को समय से पहले रिहा करने का आदेश दिया है, जिनमें से एक ने 31 साल से अधिक जेल में काटे हैं। अदालत ने कहा कि ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के दो दोषियों को समय से पहले किया रिहा।
HighLights
दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के दो दोषियों को समय से पहले रिहा किया।
एक दोषी रमेश ने 31 साल से अधिक समय जेल में बिताया।
अदालत ने कहा सजा को धीरे-धीरे मौत में नहीं बदलना चाहिए।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दुष्कर्म के तीन दशक पुराने मामले में तीस साल से ज्यादा समय तक जेल में सजा काटने वाले दोषी को बड़ी राहत देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने समय से पहले रिहा करने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति एजे भंभानी की पीठ ने टिप्पणी की कि लगातार जेल में रखना किसी गुस्से और बदले की भावना वाली व्यवस्था पर आधारित नहीं हो सकता क्योंकि यह सजा को जेल में ही धीरे-धीरे मौत में बदल देती है। इसके अलावा अलावा अदालत ने 15 सल जेल में बिताने वाले एक अन्य दोषी को भी समय से पहले रिहा करने का आदेश दिया।
पीठ ने उक्त टिप्पणी समय पूर्व रिहाई की अर्जी को नामंजूर करने के समीक्षा बोर्ड (एसआरबी) के आदेश को चुनौती देने वाली दो दोषियों की याचिकाओं पर सुनाया। पीठ ने एंटोन चेखव की लघु कथा 'द बेट' का जिक्र करते हुए कहा कि मौत की सजा इंसान को तुरंत मार देती है, लेकिन उम्रकैद उसे धीरे-धीरे मारती है।
रमेश ने 31 साल से ज्यादा समय असल में जेल में बिताया
1992 में गैर-इरादतन हत्या और दुष्कर्म की घटना के दौरान याचिकाकर्ता रमेश 19 साल का था। रमेश ने 31 साल से ज्यादा समय असल में जेल में बिताया है और छूट (मिलाकर 40 साल से ज्यादा समय हो गया है। समय से पहले रिहाई की उसकी अर्जी 18 बार नामंज़ूर की गई थी।
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याचिकाकर्ता पर आरोप है कि उसने बदले की भावना से चार साल की बच्ची का दुष्कर्म किया था क्योंकि बच्ची की मां ने उसके शादी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। पीठ ने कहा कि एसआरबी ने याचिकाकर्ता रमेश की अर्जी को नियमों व अदालती निर्देशों के बजाय निराशा में किया गया अपराध, समाज का भरोसा डिगाना और उसकी समय से पहले रिहाई बड़े पैमाने पर समाज के हित में नहीं होने जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके नामंज़ूर कर दिया था।
रमेश 25 साल से अधिक समय से तिहाड़ की प्रिंटिंग यूनिट में काम कर रहा
पीठ ने कहा कि 30 साल से ज्यादा समय तक जेल में सजा काटने वाले रमेश को जेल में एक भी चेतावनी, सजा या उसके विरुद्ध कोई रिपोर्ट नहीं मिली। पीठ ने कहा कि याची रमेश 25 साल से अधिक समय से तिहाड़ की प्रिंटिंग यूनिट में काम कर रहा है और प्रतिदिन लगभग 412 रुपये कमा रहा है।
इतना ही नहीं उसने कई कौशल विकास प्रमाणपत्र भी हासिल किए हैं। पीठ ने एसआरबी के निर्णय को स्पष्ट तौर पर मनमाना और संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन माना। वहीं, 15 साल से जेल की सजा काटने वाले तस्लीम की समय से पहले रिहाई की अर्जी एसआरबी ने चार बार खारिज की थी। उस पर एक नेपाली महिला के साथ दुष्कर्म का आरोप था।