आतंक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए एक समान नीति बनाने की मांग दिल्ली हाई कोर्ट ने ठुकराई
दिल्ली हाई कोर्ट ने आतंकी हमलों से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए एक समान नीति बनाने की याचिका खारिज कर दी। ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया फैसला। सांकेतिक तस्वीर
HighLights
हाई कोर्ट ने आतंकी पीड़ितों की नीति याचिका खारिज की।
नीतिगत निर्णय सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
अदालत ऐसे निर्देश जारी नहीं कर सकती।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। सरकारी नौकरियों में आरक्षण और आतंकी हमलों से प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए एक समान नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर विचार करने से दिल्ली हाई कोर्ट ने इन्कार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय व न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा कि नीतिगत निर्णय से जुड़े मामले पर अदालत इस तरह के निर्देश जारी नहीं कर सकती। यह सरकार के अधिकार क्षेत्र और विशेषाधिकार के दायरे में आते हैं।
पीठ ने पूछा कि सरकारी नौकरी में दो प्रतिशत आरक्षण का अधिकार कहां से मिल रहा है? पीठ ने कहा कि पहले से मौजूद अधिकारों की सुरक्षा और नए अधिकार बनाने में अंतर होता है।
पीठ ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि आप कह रहे हैं कि मृतकों के परिवार के सदस्यों को नौकरी देने के लिए एक नीति बनाई जाए और दो प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। यह सब नीति से जुड़ा मामला है।
कोर्ट ने क्या कहा?
क्या कोर्ट इस तरह के निर्देश जारी कर सकते हैं? अदालत ने उक्त टिप्पणी व सवाल याचिकाकर्ता संगठन साउथ एशियन फोरम फार पीपल अगेंस्ट टेरर की याचिका पर की।
याचिकाकर्ता संगठन की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश गुप्ता ने कहा कि वे सरकार की निष्क्रियता से दुखी हैं और उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय सहित कई अधिकारियों को पत्र लिखे हैं, लेकिन इसके बावजूद आतंकी हमलों के पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा देने, चिकित्सा सहायता या सरकारी नौकरियों में रियायतें देने के लिए एक समान नीति बनाने की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
हालांकि, पीठ ने कहा कि मांगी गई राहतें सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती हैं और कोर्ट नीति तय नहीं कर सकता।
पीठ ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता संगठन को केंद्र और दिल्ली सरकार के समक्ष प्रतिवदेन देने की छूट दी। साथ ही प्रतिवेदन पर अधिकारियों को उचित आदेश जाीर करने को कहा।