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दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा आदेश-यौन उत्पीड़न मामलों में पहचान उजागर करना गलत; पॉक्सो मामले में आरोपित की जमानत खारिज

By Agency PTIEdited By: Neeraj Tiwari
Updated: Mon, 26 Jan 2026 06:01 PM (IST)

दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़ितों की गोपनीयता सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता का नाम, अभिभावकों का नाम और पता अद ...और पढ़ें

DELHI HC (9)
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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट की एक बेंच ने दुष्कर्म पीड़िता की गोपनीयता को लेकर एक बड़ा अहम निर्णय सुनाया है। आदेश में कहा गया है कि पीड़िता का नाम, अभिभावकों का नाम और पता अदालत में कार्रवाई के समय किसी भी डॉक्यूमेंट में उजागर नहीं किया जाना चाहिए। इस संबंध में कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को आदेश जारी कर दिए हैं। 

न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा ने आदेश देते हुए दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को निर्देशित किया है कि वे इस बारे में सभी एसएचओ और जांच अधिकारियों को उचित निर्देश दें कि यौन उत्पीड़न की शिकार किसी पीड़िता की जानकारी को सार्वजिनक न किया जाए। कोर्ट ने यह आदेश एक पॉक्सो केस में आरोपित की जमानत याचिका को खारिज करते हुए दिया। कोर्ट ने 'गंभीर चिंता' जताई कि वर्तमान मामले में जांच अधिकारी द्वारा दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में पीड़िता (प्रॉसिक्यूट्रिक्स) का नाम उल्लेखित था।

आरोपित पर 2021 में एक 12-13 साल की नाबालिग लड़की को झूठे बहाने से उसके घर से ले जाकर यौन उत्पीड़न करने का आरोप है। आरोप है कि आरोपित ने पीड़ित बच्ची को एक कमरे में बंद कर दिया और जबरदस्ती उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। आरोपी ने दावा किया कि वह पीड़िता की मां के साथ सहमति से शारीरिक संबंध में था और उसे झूठा फंसाया गया है क्योंकि पीड़िता को उनके रिश्ते से आपत्ति थी।

अदालत ने कहा कि पीड़िता ने लगातार अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन किया और पुलिस को दिए अपने बयान में घटना के तरीके का स्पष्ट रूप से वर्णन किया। पीड़िता की मां से रिश्ते के आरोपित के तर्क पर अदालत ने कहा कि उसकी गवाही पर संदेह करने का आधार नहीं है। अदालत ने कहा कि पीड़िता की मां का जेल में आरोपित से मिलना या उससे रुपये लेना भी इस स्तर पर अपराध की गंभीरता को कम नहीं करता है।

अदालत ने कहा कि पीड़िता ने लगातार कहा है कि जिस आरोपित को वह चाचा कहकर बुलाती थी, उसने उसके साथ बार-बार यौन उत्पीड़न किया। आरोपित के दावों को अदालत ने यह कहते हुए ठुकरा दिया कि मामले में एक बच्ची के साथ अपराध की शिकायत की गई है और उक्त अपराध की गंभीरता का आकलन किसी तीसरे पक्ष के आचरण से नहीं किया जा सकता है। उक्त तथ्यों को देखते हुए अदालत ने जमानत याचिका खारिज कर दी।

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