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    हर छठा रेजिडेंट डॉक्टर आत्महत्या के विचार से जूझ रहा, फाइमा के सर्वे में हुआ बड़ा खुलासा

    Updated: Tue, 07 Jul 2026 04:18 PM (IST)

    दिल्ली के अरुणा आसफ अली अस्पताल में एक डॉक्टर की आत्महत्या ने रेजिडेंट डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। फाइमा के सर्वे में ...और पढ़ें

    सर्वे के मुताबिक 16.9 प्रतिशत रेजिडेंट डाॅक्टर ने आत्मघाती विचार आने की बात स्वीकार की।

    सर्वे के मुताबिक 16.9 प्रतिशत रेजिडेंट डाॅक्टर ने आत्मघाती विचार आने की बात स्वीकार की।

    HighLights

    1. दिल्ली में डॉक्टर की आत्महत्या ने बढ़ाई गंभीर चिंता।

    2. फाइमा सर्वे: 16.9% रेजिडेंट डॉक्टरों को आत्मघाती विचार।

    3. अत्यधिक कार्यभार, तनाव डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर।

    अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। दिल्ली के अरुणा आसफ अली अस्पताल के एक डाॅक्टर द्वारा एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगाकर आत्महत्या किए जाने की घटना ने डाॅक्टर के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। डाॅक्टर के राष्ट्रीय संगठन फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशंस (फाइमा) के राष्ट्रीय सर्वे ने पहले ही इस तरह की चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है। सर्वे के अनुसार, देश के लगभग हर छह में से एक रेजिडेंट डाॅक्टर ने स्वीकार किया कि अत्यधिक कार्यभार और तनाव के कारण उसके मन में कभी न कभी आत्महत्या या स्वयं को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार आए हैं।

    फाइमा के जून में जारी ‘रिव्यू मेडिकल सिस्टम-2’ (आरएमएस-2) सर्वे के मुताबिक 16.9 प्रतिशत रेजिडेंट डाॅक्टर ने आत्मघाती विचार आने की बात स्वीकार की, जबकि 87 प्रतिशत ने अत्यधिक कार्यभार के कारण मानसिक और शारीरिक थकावट झेलने की जानकारी दी। सर्वे में यह भी सामने आया कि 54.4 प्रतिशत रेजिडेंट डाॅक्टर किसी न किसी समय रेजिडेंसी छोड़ने का विचार कर चुके हैं।

    देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 1,260 रेजिडेंट डाॅक्टर पर आधारित इस सर्वे में कार्य परिस्थितियों, ड्यूटी घंटों, मानसिक स्वास्थ्य, स्टाइपेंड और संस्थागत सहयोग जैसे मुद्दों का अध्ययन किया गया। रिपोर्ट के अनुसार 61.8 प्रतिशत रेजिडेंट डाॅक्टर 36 घंटे से अधिक लगातार ड्यूटी कर चुके हैं, जबकि 63.7 प्रतिशत को 24 घंटे की ड्यूटी के बाद अनिवार्य विश्राम नहीं मिल पाता। 88 प्रतिशत ने पर्याप्त नींद न मिलने की शिकायत दर्ज कराई।

    फाइमा अध्यक्ष डाॅ. जयदीप कुमार चौधरी ने कहा कि यह केवल डाॅक्टर के कल्याण का मामला नहीं है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और उपचार की गुणवत्ता से भी सीधे जुड़ा विषय है। लगातार थकान, तनाव और नींद की कमी चिकित्सा निर्णयों तथा मरीजों की देखभाल पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

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    संगठन के अनुसार देश में करीब तीन लाख रेजिडेंट डाॅक्टर प्रशिक्षण के साथ स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ऐसे में कार्य परिस्थितियों में सुधार, पर्याप्त मानव संसाधन और मानसिक स्वास्थ्य सहायता तंत्र को मजबूत करना समय की जरूरत है। फाइमा का कहना है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर न केवल मेडिकल शिक्षा व्यवस्था बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा।

    फाइमा की प्रमुख मांगें

    • रेजिडेंट डाॅक्टर के कार्य घंटे निर्धारित हों।
    • 24 घंटे की ड्यूटी के बाद अनिवार्य विश्राम मिले।
    • 36 घंटे से अधिक लगातार ड्यूटी पर रोक लगे।
    • रिक्त पदों पर तत्काल भर्ती हो।
    • सभी मेडिकल काॅलेजों में 24×7 मानसिक स्वास्थ्य परामर्श सुविधा हो।
    • शिकायत निवारण की पारदर्शी व्यवस्था बने।
    • सभी राज्यों में समान स्टाइपेंड नीति लागू हो।
    • बाॅन्ड व्यवस्था की समीक्षा की जाए।

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