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SIR के समर्थन में उतरे पूर्व 42 जज, बोले- संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने का अभियान चिंताजनक

Published: Fri, 09 Oct 2026 01:51 PM (GMT+05:30)

देश के 42 पूर्व न्यायाधीशों ने एक खुला पत्र लिखकर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के प्रयासों पर चिंता जताई ...और पढ़ें

मुख्य चुनाव आयोग के मुख्यालय के आस-पास की गई पुलिस द्वारा घेराबंदी। फाइल फोटो

मुख्य चुनाव आयोग के मुख्यालय के आस-पास की गई पुलिस द्वारा घेराबंदी। फाइल फोटो

HighLights

  1. 42 पूर्व न्यायाधीशों ने संवैधानिक संस्थाओं पर हमलों पर चिंता जताई।

  2. उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का समर्थन किया।

  3. न्यायाधीशों ने लोकतंत्र को अस्थिर करने वाले अभियानों के प्रति आगाह किया।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश के 42 पूर्व न्यायाधीशों ने भारत की जनता को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के प्रयासों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

इसमें न्यायाधीशों ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का समर्थन करते हुए कहा कि यह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के अंतर्गत वैध है। चुनाव आयोग किसी भी समय मतदाता सूची का पुनरीक्षण कर सकता है।

लिखा- चुप रहना अब कोई विकल्प नहीं

पत्र का शीर्षक है, 'An Open Letter to the People of India: In Defence of Our Constitutional Institutions', यह 7 अक्टूबर 2026 को जारी किया गया था। पत्र में कहा गया है कि वे किसी भी राजनीतिक दल के पक्ष में नहीं लिख रहे हैं, बल्कि ऐसे समय में चुप रहना अब कोई विकल्प नहीं रह गया है।

'निहित राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित सुनियोजित अभियान'

पूर्व न्यायाधीशों ने लिखा कि भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। इनमें चुनाव आयोग केंद्र में है। उच्च न्यायपालिका और वैधानिक एजेंसियां भी इससे अछूती नहीं हैं। उन्होंने इसे 'निहित राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित सुनियोजित अभियान' बताया, जिसमें लोकतंत्र को अस्थिर करने के संभावित गंभीर परिणामों की परवाह नहीं की जा रही।

'किसी भी अदालत ने आरोप सही नहीं पाए'

पत्र में स्पष्ट किया गया है कि संस्थाओं की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उनकी बदनामी नहीं। संवैधानिक अधिकारियों को सार्वजनिक मंचों से 'चोर', 'कठपुतली' और 'समझौता करने वाले' कहा जा रहा है। चुनाव कराने वाले अधिकारियों के नाम लेकर शर्मसार किया जा रहा है और सत्ता बदलने पर प्रतिशोध की धमकी दी जा रही है। किसी भी अदालत ने इन आरोपों को सिद्ध नहीं पाया है।

एसआईआर का किया बचाव

पूर्व न्यायाधीशों ने एसआईआर प्रक्रिया का समर्थन करते हुए कहा कि यह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के अंतर्गत वैध है। चुनाव आयोग किसी भी समय मतदाता सूची का पुनरीक्षण कर सकता है। पिछले कई दशकों में ऐसी गहन पुनरीक्षण प्रक्रियाएं होती रही हैं। इसका उद्देश्य मृत व्यक्तियों, डुप्लीकेट प्रविष्टियों और स्थानांतरित निवास वालों के नाम हटाना तथा पात्र मतदाताओं को शामिल करना है, ताकि स्वच्छ मतदाता सूची बनी रहे।

मतदान से लोगों का विश्वास टूट जाएगा

उन्होंने उल्लेख किया कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी एसआईआर को वैध और चुनाव आयोग की शक्तियों के अंतर्गत माना है। पर्याप्त सुरक्षा उपाय (नोटिस, सुनवाई, आपत्ति और अपील) उपलब्ध हैं।

पत्र में चेतावनी दी गई है कि बार-बार बिना सबूत के 'वोट चोरी' जैसे आरोप लगाने और चुनावी व्यवस्था को संदेह के घेरे में लाने से जनता का विश्वास टूट सकता है।

'विश्वास ही लोकतंत्र की मुद्रा है।' अगर मतदाताओं को बार-बार यह बताया जाए कि उनका वोट मायने नहीं रखता, तो वे मतपत्र पर विश्वास खो देंगे।

किस-किस ने किए हस्ताक्षर?

हस्ताक्षरकर्ताओं में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस पंकज मित्तल तथा कई हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीश शामिल हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर व दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीसी पटेल, कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुभ्रो कमल मुखर्जी और सिक्किम हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश परमोद कोहली प्रमुख हैं।

'नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला'

पूर्व न्यायाधीशों ने राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे चुनाव लड़ें, उन्हें बदनाम न करें। अपनी शिकायतें सबूतों के साथ आयोग और अदालतों के सामने रखें। संवैधानिक संस्थाएं किसी सरकार की नहीं, बल्कि भारत की जनता की हैं। उनकी विश्वसनीयता पर हमला अंततः नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला है।