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40 साल बाद माओवादियों के आतंक से आजाद बस्तर में मनाई जा रही दीवाली, बिना डर के जश्न मना रहे लोग

Published: Sat, 07 Nov 2026 11:56 PM (GMT+05:30)

बस्तर में लगभग 40 साल बाद दीपावली का त्योहार बिना किसी डर के मनाया जा रहा है, जहां पहले माओवादी हिंसा का खौफ था।

बस्तर में बिना डर के दीवाली मना रहे लोग (AI जेनरेटेड फोटो)

बस्तर में बिना डर के दीवाली मना रहे लोग (AI जेनरेटेड फोटो)

HighLights

  1. बस्तर में 40 साल बाद भयमुक्त दीपावली का जश्न।

  2. माओवादी हिंसा के अंत से बाजारों में रौनक लौटी।

  3. बच्चे बिना डर खरीद रहे पटाखे, घरों में दीये सजे।

अनिमेष पाल, जगदलपुर। कभी बस्तर के जंगलों में धमाके की आवाज गूंजते ही गांवों में सन्नाटा पसर जाता था। दीपावली पर पटाखे फोड़ना भी लोगों को डराता था।

बच्चों की आतिशबाजी पर पहरा रहता और तेज आवाज सुनकर बड़ों को माओवादियों के हमले की आशंका होती थी। 31 मार्च 2026 को माओवादी हिंसा के अंत की घोषणा के बाद हालात बदल रहे हैं।

बस्तर में डर का अंत

करीब 40 साल बाद बच्चे बिना डर पटाखे खरीद रहे हैं, घरों में दीये सज रहे हैं और बाजारों में आतिशबाजी की दुकानें लगी हैं।

सालों तक पटाखों की आड़ में सुरक्षा कैंपों पर हमले की आशंका से कई संवेदनशील गांवों में आतिशबाजी पर रोक रहती थी। जंगलों और रास्तों में बारूदी सुरंगों तथा आइईडी (इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) का डर भी लोगों को सतर्क रखता था।

अब बस्तर की दीपावली भय से भरोसे की ओर बढ़ रही है।इस बार बीजापुर के पटाखा बाजार में बदलाव साफ दिख रहा है। कभी माओवादी प्रभाव के लिए पहचाने जाने वाले गंगालूर और उसूर में भी दुकानें सजी हैं।

संतोषपुर के मज्जी मंगल बताते हैं कि इस बार ग्रामीण पटाखे लेने पहुंच रहे हैं। आवापल्ली के सुमीत भी कहते हैं कि इस बार जमकर पटाखे फोड़ेंगे। उसूर के भीमा कट्टर और बासागुड़ा के व्यापारी सईद खान भी गांवों में बढ़ते उत्साह की बात कहते हैं।

सुकमा के जगरगुंडा से लेकर अबूझमाड़ तक सड़क, बिजली और सुरक्षा की पहुंच के साथ सामान्य जनजीवन लौट रहा है।

डर के पीछे था बारूद का खौफ

बारूद के डर से पटाखों की आवाज भी हमले की आशंका जगाती थी। साल 2001 से मार्च 2026 तक बस्तर संभाग के सात जिलों में 4,607 आइईडी बरामद किए गए और 1,280 विस्फोट दर्ज हुए।

यहां हर गांव की अपनी दीवाली है दीयारी

बस्तर के आदिवासी अंचलों में दीपावली से अलग ‘दीयारी तिहार’ मनाया जाता है। नई फसल और पशुधन के प्रति कृतज्ञता के इस पर्व पर धान की कटाई के बाद ग्राम देवता, पूर्वजों और मवेशियों की पूजा होती है। तारीख गांव की परंपरा से तय होती है और रस्में तीन दिन से महीनेभर तक चलती हैं।

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