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'शरिया कोर्ट नहीं सुना सकता पत्नी को तलाक देने का फैसला', छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रद किया इदारा-ए-शरिया का आदेश

Published: Wed, 09 Sep 2026 11:09 PM (IST)

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी निजी धार्मिक संस्था या शरिया कोर्ट वैवाहिक मामलों में न्यायिक निर्धारण या तलाक की घोषणा नहीं कर सकता।

शरिया कोर्ट के तलाक फैसले पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

शरिया कोर्ट के तलाक फैसले पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

HighLights

  1. निजी शरिया कोर्ट को न्यायिक अधिकार नहीं।

  2. वैवाहिक दर्जे का निर्धारण नहीं कर सकते।

  3. इदारा-ए-शरिया का तलाक आदेश अमान्य।

डिजिटल डेस्क, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि कोई निजी धार्मिक संस्था या स्वयं को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून से स्थापित अदालत का दर्जा नहीं रखता। ऐसी संस्थाएं न तो किसी महिला के वैवाहिक दर्जे का न्यायिक निर्धारण कर सकती हैं और न ही विवाह विच्छेद की कानूनी घोषणा कर सकती हैं।

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने रायपुर के इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट द्वारा 18 जनवरी 2022 को जारी उस आदेश को कानूनी अधिकार से अमान्य घोषित कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया गया था।

कोर्ट ने कहा कि इदारा-ए-शरिया का आदेश किसी वैधानिक न्यायिक व्यवस्था से जारी नहीं हुआ है। इसलिए इससे न विवाह समाप्त हो सकता है और न किसी पक्ष के कानूनी अधिकार, स्थिति या दायित्व में बदलाव हो सकता है।

याचिकाकर्ता रायपुर के टिकरापारा निवासी निरोश अब्बासी के पहले पति की 2015 में मृत्यु हुई थी। इसके बाद उन्होंने 18 जुलाई 2020 को मोहम्मद आबिद खान से दूसरी शादी की। विवाह के बाद बच्चों के नए परिवार में समायोजन को लेकर दंपती में विवाद हुआ।

महिला के अनुसार, इसी विवाद के बाद उन्हें तलाक देने की प्रक्रिया शुरू की गई। पति ने दावा किया कि उन्होंने तीन चरणों में 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को भेजे गए संदेश के जरिए तलाक-ए-हसन दिया था।

फैसलों या फतवों का कोई कानूनी महत्व नहीं

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे अनौपचारिक फोरम द्वारा जारी किए गए फैसलों या फतवों का कोई कानूनी महत्व नहीं है और उन्हें दबाव डालकर लागू नहीं किया जा सकता। पिटीशनर ने दलील दी कि प्राइवेट संस्थाएं संविधान के तहत बनी कोर्ट में दी गई न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं।

राज्य सरकार ने कहा कि भारतीय संविधान धर्म के आधार पर किसी भी पैरेलल ज्यूडिशियल सिस्टम को मान्यता नहीं देता है।

प्राइवेट संस्था कोर्ट का अधिकार नहीं ले सकती

हाई कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर फैसला देने से परहेज किया, यह कहते हुए कि बड़ा मुद्दा अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

इस प्रकार, कोर्ट ने इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट के आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित करते हुए स्पष्ट किया कि धार्मिक राय निजी आस्था को गाइड कर सकती है, लेकिन कोई भी प्राइवेट संस्था कानूनी तौर पर बनी कोर्ट का अधिकार नहीं ले सकती।