₹15 करोड़ से ₹150 करोड़ बनाने का फॉर्मूला, इन 10 सवालों में सीख जाएंगे सबकुछ! अपैरल बिजनेस की Inside Story
अपैरल एक्सपोर्ट सेक्टर में व्यापार शुरू करने के लिए निवेश, टर्नओवर और ग्लोबल मार्केट तक पहुंचने के तरीके जानें। AEPC ...और पढ़ें
HighLights
अपैरल सेक्टर में निर्यात की असीम संभावनाएं।
कम निवेश से मर्चेंट एक्सपोर्टर बनकर करें शुरुआत।
सरकार निर्यातकों को विभिन्न योजनाओं से सहायता प्रदान करती है।
नई दिल्ली| अगर आप भी बिजनेस में उतरना चाहते हैं तो अपैरल सेक्टर एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है। अपैरल सेक्टर कपड़ों की दुनिया है, जिसकी जरूरत कभी खत्म नहीं होती बल्कि बढ़ती जाती है। जागरण बिजनेस के वीकली शो 'MSME बदलाव' में अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के सेक्रेटरी जनरल मिथिलेश्वर ठाकुर ने इस बिजनेस से जुड़ी सारी बातें बताई हैं। जिसमें इन्वेस्टमेंट से लेकर टर्नओवर और ग्लोबल मार्केट तक पहुंचने के सारे तरीके शामिल हैं। 10 सवालों में अपैरल बिजनेस से जुड़ी सारी बातें जान लेते हैं।
सवाल 1: अपैरल सेक्टर में एक्सपोर्ट की संभावनाएं कितनी हैं? कोई नया आदमी अगर जुड़ना चाहे तो उसके तरीके क्या होते हैं?
जवाब : अपैरल सेक्टर भारत का एक बहुत महत्वपूर्ण सेक्टर है और एम्प्लॉयमेंट जनरेशन (रोजगार सृजन) के पॉइंट ऑफ व्यू से यह बहुत ही मायने रखता है। यह कृषि क्षेत्र के बाद सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है रोजगार सृजन करने के लिए और इसमें एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए असीम संभावनाएं हैं।
भारत ने 2021 के बाद करीब 38 देशों से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) साइन किया है। जिसके चलते असीम संभावनाएं हैं क्योंकि हमारे पास जो एक कॉस्ट टैरिफ डिसएडवांटेज था, वो खत्म हो गया और हम अपने कॉम्पिटिटिंग कंट्रीज बांग्लादेश, वियतनाम, टर्की और कंबोडिया के ऐट पार (at par) हो जाएंगे। मेरे नजरिए से अगला जो दशक है, वो टेक्सटाइल और अपैरल इंडस्ट्री का दशक होने वाला है।
सवाल 2: अगर कोई नया आदमी अपैरल एक्सपोर्ट के बिजनेस से जुड़ना चाहे तो वो कैसे जुड़ सकता है? किससे कांटेक्ट करना होगा?
जवाब: पहली बात यह है कि यह ध्यान रखना होगा कि उनका बिजनेस मॉडल क्या है। कोई 'मर्चेंट एक्सपोर्टर' बनकर जुड़ना चाहता है या वो खुद मैन्युफैक्चरिंग यूनिट इस्टैब्लिश करना चाहता है। मेरा सुझाव ये होगा कि आप क्षेत्र में पहले जुड़ना चाहें तो यह प्रैक्टिकल होगा कि आप मर्चेंट एक्सपोर्टर की तरह जुड़ें ताकि आपका निवेश (Investment) मिनिमम हो। और आप वर्कर मैनेजमेंट की समस्याओं से, कंप्लायंस मैनेजमेंट की समस्याओं से या एब्सेंटिज्म ऑफ वर्कर सहित एक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को मेंटेन करने के लिए आने वाली समस्याओं को बाईपास कर सकें शुरू में।
इसके अलावा अपना ध्यान केंद्रित कर सकें बायर एक्विजिशन (Buyer Acquisition) पर, प्रोडक्ट सैंपलिंग पर, प्रोडक्ट डेवलपमेंट पर, सप्लाई चेन बिल्ड-अप करने पर। एक अच्छा सा रिश्ता बना पाएं विदेशी बायर्स के साथ, ताकि बाद में जब आपका बिजनेस ग्रो करे, तो उसके बाद आप सोच सकते हैं कि एक मैन्युफैक्चरिंग इस्टैब्लिशमेंट करके आगे बढ़ सकते हैं।
सवाल 3: अगर कोई पहली बार इस सेक्टर में जुड़ रहा है और अपैरल एक्सपोर्ट करना चाहता है, तो उसके लिए कम से कम कितना इन्वेस्टमेंट होना जरूरी है?
जवाब: अगर आप मर्चेंट एक्सपोर्टर की तरह जाएं तो 15 से 20-25 लाख में हो सकता है । क्योंकि आपका जो निवेश होगा वो मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में ऑब्वियसली नहीं होगा। आप प्रोडक्ट सैंपलिंग, प्रोडक्ट डेवलपमेंट पर ध्यान देंगे, आप एक्सपोर्ट आर्डर को लेने और उसको सर्विस करने के बारे में सोचेंगे, और आपको बिजनेस रजिस्ट्रेशन करने की जो जरूरतें हैं वो आप पूरा करना चाहेंगे।
सवाल 4: अपैरल मैन्युफैक्चरर के रूप में काम शुरू करते हैं तो टर्नओवर और कमाई कितनी होती है?
जवाब: अगर आप मैन्युफैक्चरर के रूप में भी अगर आते हैं, तो ये एक ऐसा क्षेत्र है जहां बहुत कम इन्वेस्टमेंट से आप बहुत ज्यादा बिजनेस जनरेट कर सकते हैं, ये रेश्यो बहुत ज्यादा है। अगर आप प्लांट एंड मशीनरी में 15 करोड़ का इन्वेस्टमेंट करते हैं, तो आपके पास 1000 मशीन होंगी, आपको 2000 वर्कर्स की आवश्यकता होगी और आप साल में 150 करोड़ का टर्नओवर कर सकते हैं। हालांकि ये सिर्फ मशीनों में इन्वेस्टमेंट है। लैंड एंड बिल्डिंग का इन्वेस्टमेंट कुछ 40 करोड़ का होगा, लेकिन प्लांट एंड मशीनरी का 10 गुना ज्यादा आपका एनुअल टर्नओवर हो रहा है।
सवाल 5: एक्सपोर्टर को कस्टमर कैसे मिलते हैं विदेशों में? वो कैसे बायर्स को हायर करते हैं या उनसे कनेक्ट होने का तरीका क्या है?
जवाब: इसके दो तरीके हैं। ट्रेडिशनल तरीका ये है कि आप बायर-सेलर मीट में भाग लें जो इंडस्ट्री एसोसिएशन या एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल कराती हैं। या दूसरा है कि जो ओवरसीज में बड़े-बड़े एग्जीबिशन होते हैं वहां पार्टिसिपेट करें तो वहां आपको बायर्स मिल सकते हैं। 'रिवर्स बायर-सेलर मीट' होता है जहां एग्जीबिटर बाहर नहीं जाकर यहीं रहता है और बायर्स बाहर से आते हैं। ये तो ट्रेडिशनल तरीका हो गया।
इसके अलावा अब बहुत सारे चैनल खुले हुए हैं। आप लिंक्डइन प्रोफेशनल ज्वाइन करके उससे कर सकते हैं। कई B2B डिजिटल प्लेटफार्म हैं उसके थ्रू बायर ये कर सकते हैं। डिजिटल शोरूम भी हैं जहां कोई भी एग्जीबिटर डिजिटली अपने बायर के साथ मिल सकता है। साथ ही बहुत सारे ब्रांड्स हैं उनके बाइंग एजेंट्स होते हैं, बाइंग हाउसेस होते हैं, उनसे कनेक्ट कर सकते हैं।
सवाल 6: इस सेक्टर से अगर कोई पहली बार जुड़ रहा है, तो क्या रजिस्ट्रेशंस होते हैं, क्या कंप्लायंस होते हैं?
जवाब: कोई फर्म या कंपनी बनाई है तो सबसे पहले आपको करंट अकाउंट खोलना होगा। फिर आपको एक्सपोर्ट करने के लिए इम्पोर्टर-एक्सपोर्टर कोड (IEC) लेना होता है। उसके पहले आपको पैन (PAN) नंबर की जरूरत होती है। आपको GST सर्टिफिकेशन की जरूरत है। जो मैन्युफैक्चरर नहीं हैं उनको भी GST रजिस्ट्रेशन की जरूरत होती है क्योंकि एक्सपोर्ट GST में जीरो रेटेड है। अगर आप मैन्युफैक्चरर हैं तो आपको 'उद्यम' रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता है। फिर आपको एक्सपोर्ट बेनिफिट्स चाहिए तो उसके लिए रजिस्ट्रेशन कम मेंबरशिप सर्टिफिकेट (RCMC) चाहिए काउंसिल्स का।
सवाल 7: अपैरल एक्सपोर्ट के लिए सरकार कोई मदद करती है? कोई खास स्कीम है ताकि नए-नए लोग इससे जुड़ सकें?
जवाब: इंटरनेशनली एक मेथोडोलॉजी है कि "Exporters are not supposed to export taxes", आप टैक्स का निर्यात नहीं करते हैं। तो जितने भी इनडायरेक्ट टैक्स लगते हैं वो सब रिफंड मिल जाता है, एक फॉरेन ट्रेड पालिसी है। उसके अंदर जितनी भी एक्सपोर्ट प्रमोशन स्कीम्स हैं चाहे वो एडवांस ऑथराइजेशन की स्कीम हो, EPCG स्कीम हो, या रोसक्टल (RoSCTL - State and Central Taxes and Levies) है। इसके अलावे PLI की स्कीम इंट्रोड्यूस हुई है। PM MITRA पार्क है जहां आपको सारी सुविधाएं प्लग एंड प्ले की मिलेंगी। क्रेडिट गारंटी स्कीम्स एक्सपोर्टर्स के लिए लांच किया गया है। MAI (Market Access Initiative) सपोर्ट है कि अगर आप कहीं बाहर के एग्जीबिशन में पार्टिसिपेट करना चाहते हैं तो सरकार आपको एक राशि देती है जिससे आपका कॉस्ट कम हो सके।
सवाल 8: कपड़ों पर मार्जिन कितना होता है? निर्यातकों को कितना लाभ मिलता है?
जवाब: ये निर्भर करता है कि आप क्या प्रोडक्ट एक्सपोर्ट कर रहे हैं। ये 8% से 20% या उससे ज्यादा तक मार्जिन हो सकता है। अगर आपके परिधान में डिज़ाइन एलिमेंट ज्यादा है, उसमें डिज़ाइन कैपेबिलिटीज ज्यादा हैं, तो ज्यादा मार्जिन होगा। अगर आप बेसिक या कोर प्रोडक्ट कर रहे हैं तो आपके मार्जिन कम होंगे।
सवाल 9: भुगतान का रिस्क कितना होता है? कई बार माल डिलीवर होने के बाद पैसे फंस जाते हैं तो कोई कवर मिलता है?
जवाब: भुगतान का रिस्क तो लोकल सेल में भी होता है तो निर्यात में तो हो ही सकता है। लेकिन उसके बड़े सारे इंस्ट्रूमेंट्स हैं जिससे आप बच सकते हैं। एक तो है कि आप ECGC (Export Credit Guarantee Corporation) कवर ले सकते हैं, जिसको आपको प्रीमियम देना पड़ता है और वो रिस्क कवर करती है। अगर बायर ने डिफ़ॉल्ट किया तो ECGC देती है। दूसरा ये है कि आप किस मोड के पेमेंट कर रहे हैं। अगर लेटर ऑफ क्रेडिट (LC) के थ्रू ऑपरेट कर रहे हैं तो आप बिल्कुल सिक्योर हैं। जैसे ही आपने अपने बिल ऑफ लैडिंग बैंक को दिखाया, वो देखते ही आपको पेमेंट दे देती है।
सवाल 10: नए एक्सपोर्टर को कौन सी गलतियों से बचना चाहिए ताकि वो अच्छा प्रॉफिट कमा सकें?
जवाब: जो बहुत ही कॉमन मिस्टेक्स लोग करते हैं वो ये है कि लोग ज्यादा ध्यान 'कॉस्ट' पर देते हैं कि कितना सस्ता हमारा प्रोडक्ट होना चाहिए, और कॉस्ट की होड़ में लोग क्वालिटी को भूल जाते हैं। हमें फोकस कॉस्ट पर करना जरूरी है बट हमें उससे ज्यादा ध्यान देना चाहिए 'क्वालिटी' पर और 'कंप्लायंस' पर। आजकल यूरोप और जितने डेवलप्ड देश हैं वो ESG कंप्लायंस पर जाते हैं। वो चाहते हैं कि आपके कपड़े बनाने में कार्बन फुटप्रिंट मिनिमल हो, रिसाइक्लेबल होना चाहिए, थ्रेड की ट्रेसेबिलिटी होनी चाहिए। तो अगर हम कंप्लायंस ढंग से हो और क्वालिटी पर ध्यान दें तो मुझे लगता है कि कॉस्ट ज्यादा भी होगा तो भी बायर सामान खरीदेंगे।
