सरकार ₹2125 में खरीद रही प्याज, किसान बेचने को राजी नहीं! उत्पादक संघ ने बताए एजेंसियों को ना देने के 3 बड़े कारण
सरकार द्वारा ₹2125 प्रति क्विंटल पर प्याज खरीदने के बावजूद महाराष्ट्र के किसान सरकारी एजेंसियों को बेचने से इनकार कर ...और पढ़ें

किसानों ने सरकारी एजेंसियों को प्याज बेचने से किया इंकार
HighLights
किसान मंडियों में ₹2500 प्रति क्विंटल पा रहे हैं।
सरकारी एजेंसियों के गुणवत्ता मानक बहुत सख्त हैं।
बफर स्टॉक से किसानों को भविष्य में नुकसान होता है।
नई दिल्ली| प्याज किसानों को उचित दाम ना मिलने के कारण जून-जुलाई के महीने में महाराष्ट्र के प्रमुख प्याज उत्पादक जिलों में किसानों का विरोध देखने को मिला था। किसानों के प्रदर्शन के बाद सरकार ने NAFED और NCCF को सीधे किसानों से प्याज खरीदने के निर्देश दिए थे। अब किसानों ने सरकारी एजेंसियों को प्याज बेचने से इंकार कर दिया है। जिसके बाद उपभोक्ता मंत्रालय बफर स्टॉक को लेकर चिंतित है।
सरकार ने इस साल 2 लाख टन प्याज खरीदने का लक्ष्य निर्धारित किया था। लेकिन अब तक सिर्फ 5,000 टन ही प्याज की सरकारी खरीद हो पाई है, जो कुल लक्ष्य का सिर्फ 5 प्रतिशत है। महाराष्ट्र प्याज उत्पादक किसान संघ के अध्यक्ष भारत दिघोले ने जागरण बिजनेस खास बातचीत कर सरकारी एजेंसियों को प्याज ना बेचने के 3 मुख्य कारण बताए।
NAFED और NCCF को प्याज ना बेचने की वजहें
पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र के प्रमुख प्याज उत्पादक जिलों में किसानों ने सरकार का भारी विरोध किया था। किसानों का आरोप था कि सरकार उन्हें जो भाव दे रही है उससे उनकी लागत भी नहीं निकल पा रही है। कई मामलों में प्याज के दाम ₹1 प्रति किलो से भी कम (Onion Price) हो गए थे, जिसके बाद केंद्र सरकार की ओर से सरकारी एजेंसियों को सीधे किसानों से प्याज खरीदने के निर्देश दिए गए थे। अब किसान एजेंसियों को प्याज देने की बजाय सीधे मंडियों में बचे रहे हैं और इसके 3 मुख्य कारण भी बताए।
कीमत में अंतर
सरकार ने अब तक कई बार प्याज की कीमतों में इजाफा किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक प्याज की खरीद कीमत (MAPP) 13% बढ़ाकर ₹2,125 प्रति क्विंटल कर दिया गया है लेकिन भारत ने बताया कि किसानों को मंडियों में औसतन ₹2500 प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है, इसलिए एजेंसियों को देने का सवाल ही नहीं उठता है।
गुणवत्ता मानक में कड़ाई
महाराष्ट्र प्याज उत्पादक किसान संघ के अध्यक्ष ने बताया कि एजेंसियों के प्याज खरीदने में गुणवत्ता मानक मायने रखता है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई किसान 100 क्विंटल प्याज बेचता है तो 10-15 क्विंटल प्याज को कम ग्रेड का मानकर इसकी कीमत घटा दी जाती है। कई बार वापस लौटा दिया जाता है जिसके कारण किसान की माल ढुलाई का खर्च भी आता है उस प्याज की कीमत बहुत अधिक गिर जाती है।
बफर स्टॉक के नुकसान का रिस्क
भारत दिघोले ने सरकारी एजेंसियों को प्याज ना बेचने की तीसरी महत्वपूर्ण वजह बफर स्टॉक को बताया है। उन्होंने कहा कि NAFED जैसी एजेंसियां किसानों से सस्ते में प्याज खरीद कर बफर स्टॉक मजबूत कर लेती हैं। बारिश के बाद सितंबर-अक्टूबर में जब प्याज की कीमतें बढ़ने लगती हैं और किसान अपने स्टाक से प्याज निकालकर बेचते हैं तो उस वक्त नफेड अपने स्टॉक से सस्ते में प्याज बेचना शुरू कर देता है, जिससे प्याज को स्टॉक में रखने वाले किसानों को नुकसान होता है।
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भारत ने बताया कि इससे किसान ना फसल की कटाई के समय प्याज को अच्छे दाम में बेच पाता है, ना पीक सीजन में अच्छी कमाई कर पाता है, क्योंकि उस वक्त नफेड अपने स्टॉक से सस्ते में प्याज बेचना शुरू कर देता है। इन कारणों का हवाला देते हुए किसानों ने एजेंसियों की बजाय मंडियों में प्याज बेचने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
एजेंसियों को इस शर्त पर बेचेंगे प्याज
भारत दिघोले ने बताया कि सरकार बफर स्टॉक को लेकर चिंतित है लेकिन किसानों को प्याज का सही भाव नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अपनी एजेंसियों, NAFED और NCCF के जरिए 3,000 रुपये प्रति क्विंटल (30 रुपये प्रति किलो) की दर से प्याज की खरीदी करे, जिससे किसानों की लागत निकलने के साथ कुछ कमाई भी हो सके। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि हम यह भी चाहते हैं कि NAFED और NCCF, APMC में नीलामी प्रक्रिया के जरिए सीधे किसानों से प्याज खरीदें।
