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भारत का टॉप कॉलेज SRCC बनाने वाले बिजनेसमैन लाला श्री राम कौन थे? जहां के छात्रों को पीएम मोदी ने कहा OG

Published: Sat, 05 Sep 2026 09:45 PM (IST)Updated: Sun, 06 Sep 2026 08:50 AM (IST)

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा SRCC के शताब्दी समारोह में संबोधन के बाद लाला श्री राम की चर्चा हुई, जिन्होंने कॉलेज की ...और पढ़ें

लाला श्री राम: SRCC के संस्थापक और भारतीय उद्योग के दूरदर्शी नायक

लाला श्री राम: SRCC के संस्थापक और भारतीय उद्योग के दूरदर्शी नायक

HighLights

  1. शुरुआती असफलताओं के बाद DCM को शिखर तक पहुंचाया।

  2. कर्मचारियों के लिए प्रोविडेंट फंड और मुनाफ़ा-साझाकरण शुरू किया।

  3. SRCC, LSR जैसे प्रमुख शिक्षण संस्थान स्थापित किए।

नई दिल्ली। 'बिजनेस सिर्फ कुछ घंटे काम पर जाने से नहीं खड़े होते बल्कि यह सोच, सपने देखने, कल्पना करने और काम करने से बनते हैं। ये कथन है उस दिग्गज लाला श्री राम का जिन्होंने इस कॉलेज की नींव रखी। हाल ही में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के मशहूर श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (PM Modi at SRCC) के शताब्दी समारोह में छात्रों को संबोधित किया, तो सबका ध्यान स्वाभाविक रूप से उस दूरदर्शी व्यक्ति की ओर गया जिन्होंने इस कॉलेज की स्थापना की थी। आज लाला श्री राम को आजाद भारत के प्रमुख शिक्षण संस्थानों और सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक के निर्माता के तौर पर याद किया जाता है। लेकिन शिखर तक पहुंचने का उनका सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था।

एक 'असफल' एंटरप्रेन्योर ने इतना बड़ा साम्राज्य कैसे खड़ा किया?

राम नवमी 27 अप्रैल, 1884 को जन्मे श्री राम की पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत साधारण रही। उन्होंने चांदनी चौक के एक म्युनिसिपल स्कूल से जैसे-तैसे मैट्रिक पास किया और कुछ समय के लिए हिंदू कॉलेज में भी पढ़े, लेकिन फिर व्यापार की दुनिया ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया।

नाम कमाने से पहले, उन्हें स्टेशनरी की दुकान और कॉटन-गिनिंग फैक्ट्री के मामले में असफलता का कड़वा अनुभव मिला। इसके बाद के कुछ साल उन्होंने रावलपिंडी में एक कॉन्ट्रैक्टर के यहां मुनीम (अकाउंटेंट) के तौर पर काम करते हुए बिताए। जब आखिरकार 25 साल की उम्र में वे अपने परिवार की कंपनी, दिल्ली क्लॉथ एंड जनरल मिल्स (DCM) से जुड़े, तो उन्हें बिना किसी खास भूमिका या बिना किसी वेतन के उनके पिता ने बेमन से काम पर रखा था।

उनकी जबरदस्त तरक्की का राज क्या था?

श्री राम की कामयाबी किसी एक बड़े बदलाव वाले काम से नहीं, बल्कि अपने काम की बारीकियों में लगातार और खुद शामिल होकर काम करने से मिली थी। वे अपनी सुबह मिल के गेट पर शुरू करते, फिर अकाउंट्स डिपार्टमेंट जाते और उसके बाद फैक्ट्री फ्लोर पर काम भी देखते थे। घर लौटते समय वे कपड़ों की दुकानों पर भी रुकते और सेल्समैन से पूछते कि किन कपड़ों की मांग ज्यादा है। वे अपने बिजनेस को वैसे ही समझते थे जैसे कोई व्यक्ति ब्रेल लिपि को समझता है। हर छोटी-छोटी बात को छूकर, सूंघकर और गहराई से समझकर काम करते थे।

उन्हें असली कामयाबी पहले विश्व युद्ध के दौरान धैर्य के साथ शेयर जमा करने की रणनीति से मिली। जब ब्रिटिश डायरेक्टर जिमखाना में मौज-मस्ती में व्यस्त थे, तब श्री राम ने चुपचाप उन छोटे निवेशकों से DCM के शेयर खरीद लिए जिनका कंपनी से भरोसा उठ गया था। इसी बीच, उन्होंने अपने पिता को सेना के लिए टेंट बनाने का फायदेमंद कॉन्ट्रैक्ट लेने के लिए राजी किया और उससे हुई कमाई का इस्तेमाल और शेयर खरीदने में किया। युद्ध खत्म होने तक, उनका परिवार कंपनी का सबसे बड़ा शेयरहोल्डर बन चुका था।


उन्हें भारतीय उद्योग का अगुआ क्यों माना जाता था?

1930 के दशक में, श्री राम ने अपने कारोबार को चीनी, वनस्पति, इलेक्ट्रिक मोटर और कैपेसिटर के क्षेत्र में फैलाया, उन्होंने जान-बूझकर उन चीजों पर ध्यान दिया जिनका भारत में उत्पादन नहीं हो पा रहा था। जब उन्होंने 'ऊषा सिलाई मशीन' लॉन्च की, तो यह सिर्फ एक बिजनेस नहीं, बल्कि एक सोच को जाहिर करने जैसा भी था। उन्होंने अपने इंजीनियरों को विदेशी मॉडलों को खोलकर उन्हें शुरू से दोबारा बनाने का काम सौंपा, ताकि वे भारत की धूल और नमी वाले मुश्किल माहौल में भी ठीक से काम कर सकें।

प्रोडक्ट्स के अलावा, उनकी सबसे बड़ी पूंजी उनके कर्मचारी थे। अपने समय से काफी आगे की सोच रखते हुए, उन्होंने 1920 में अपने कर्मचारियों के लिए प्रोविडेंट फंड शुरू किया और 1931 में मुनाफ़े में हिस्सेदारी वाला बोनस भी लागू किया। उनका मानना था कि कोई मैन्युफैक्चरिंग प्लांट उतना ही भरोसेमंद होता है, जितने भरोसेमंद उसे चलाने वाले लोग होते हैं।

आज लाला श्री राम की क्या विरासत है?

मजबूत नींव बनाने की उनकी सोच 1947 में अपने चरम पर पहुंची, जब उन्होंने देश का पहला स्वतंत्र, नॉन-प्रॉफिट कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च हाउस 'श्रीराम इंस्टीट्यूट फॉर इंडस्ट्रियल रिसर्च' शुरू किया। 1920 में 'कमर्शियल एजुकेशन ट्रस्ट' से शुरुआत करके, उन्होंने उस संस्थान को आगे बढ़ाया जो बाद में मशहूर 'श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स' (SRCC) बना। 1956 में, उन्होंने अपनी पत्नी फूलन देवी की याद में 'लेडी श्री राम कॉलेज फॉर विमेन' (LSR) की स्थापना की।

जब जनवरी 1963 में लाला श्री राम का निधन हुआ, तो वे अपने पीछे एक विशाल औद्योगिक साम्राज्य और ऐसे शिक्षण संस्थान छोड़ गए जो आज भी भारत के भविष्य को आकार दे रहे हैं। उनका जीवन उनके अपने इन शब्दों का सटीक उदाहरण था कि, "जीवन के किसी भी क्षेत्र में तब तक कोई वास्तविक या स्थायी सफलता नहीं मिल सकती, जब तक कि कोई व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास न करे और सेवा की भावना से काम न करे।"

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