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JP Associates: NCLT कमेटी की रिपोर्ट से हड़कंप, 20 हजार घर खरीदारों का भविष्य अंधेरे में; ₹3,000 करोड़ का फंड भी फंसा

Published: Tue, 13 Oct 2026 09:06 AM (IST)

NCLT समिति की रिपोर्ट ने जेपी इन्फ्राटेक के अधूरे प्रोजेक्ट्स में गंभीर खामियां उजागर की हैं, जिससे हजारों घर खरीदारों का इंतजार और बढ़ गया है।

JP के अधूरे घरों पर NCLT कमेटी ने उठाए सवाल

JP के अधूरे घरों पर NCLT कमेटी ने उठाए सवाल

HighLights

  1. NCLT समिति ने जेपी इन्फ्राटेक प्रोजेक्ट्स में खामियां पाईं।

  2. निर्माण में देरी, मजदूर और फंडिंग की कमी मुख्य मुद्दे।

  3. सुरक्षा ग्रुप ने रिपोर्ट से असहमति जताई, खरीदार परेशान।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: नोएडा में अपने घर का सपना देखकर लाखों रुपये लगाने वाले परिवारों का इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। सालों से फ्लैट की चाबी का इंतजार कर रहे जेपी (JP associates) के होमबायर्स के लिए अब एक नई चिंता सामने आई है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की ओर से गठित कमेटी ने घर खरीदारों की शिकायतों को काफी हद तक सही पाया है। कमेटी ने निर्माण में देरी, काम की गुणवत्ता, मजदूरों की कमी, फंडिंग और प्रोजेक्ट की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

क्या है मामला?

रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने 20 अगस्त को अपनी अंतिम रिपोर्ट में इन समस्याओं का जिक्र किया। रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया कि जेपी इन्फ्राटेक के प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की जिम्मेदारी संभाल रहे सूरक्षा ग्रुप की ओर से रेजोल्यूशन प्लान की शर्तों का कितना पालन किया गया है।

97 अधूरे प्रोजेक्ट्स, 10164 घरों का काम बाकी

जेपी इन्फ्राटेक के रुके हुए प्रोजेक्ट्स (projects) को पूरा करने की जिम्मेदारी सुरक्षा ग्रुप ने संभाली थी। कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 97 रुके हुए प्रोजेक्ट्स में 10,164 रिहायशी यूनिट्स शामिल हैं। घर खरीदारों का कहना है कि कई मामलों में फ्लैट का कब्जा देने का दावा किया जा रहा है, जबकि बुनियादी सुविधाएं अभी पूरी तरह तैयार नहीं हैं।

जेपी विशटाउन, नोएडा में करीब 20,000 परिवार 10 साल से भी ज्यादा समय से अपने घरों का इंतजार कर रहे हैं। खरीदारों की नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि इतने लंबे इंतजार के बावजूद उनके घरों की डिलीवरी और प्रोजेक्ट पूरा होने की स्थिति साफ नहीं है।

12,000 मजदूरों की जरूरत, लेकिन...

कमेटी ने निर्माण कार्य में मजदूरों की संख्या को भी देरी की एक बड़ी वजह बताया है। रेजोल्यूशन प्लान के मुताबिक, बड़े पैमाने पर फैले इन प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने के लिए करीब 12,000 मजदूरों की जरूरत थी। लेकिन कमेटी के आकलन के मुताबिक, विभिन्न साइटों पर करीब 3,500 से 4,000 मजदूर ही काम कर रहे थे। निरीक्षण के दौरान कुछ साइटों पर केवल 200-300 मजदूर दिखाई दिए।

सूरक्षा ग्रुप ने कमेटी को बताया था कि उसके सभी प्रोजेक्ट्स में 4,000 से ज्यादा मजदूर काम कर रहे हैं। हालांकि, कमेटी साइट विजिट और ठेकेदारों से बातचीत के बाद इस दावे से संतुष्ट नहीं हुई। रिपोर्ट में कहा गया कि पर्याप्त मजदूर नहीं होना निर्माण में देरी की प्रमुख वजहों में से एक है।

3000 करोड़ की वर्किंग कैपिटल कहां है?

कमेटी ने फंडिंग को लेकर भी सवाल उठाए हैं। रेजोल्यूशन प्लान के मुताबिक, सफल बोलीदाता यानी successful resolution applicant (SRA) को रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स पूरे करने के लिए 90 दिनों के भीतर ₹3000 करोड़ की वर्किंग कैपिटल की व्यवस्था करनी थी। कमेटी के मुताबिक अब तक इतनी वर्किंग कैपिटल की स्वीकृत व्यवस्था नहीं की गई है। रिपोर्ट में कहा गया कि फंडिंग की मंजूरी हासिल करना और जरूरत के मुताबिक उस फंड का इस्तेमाल करना दो अलग-अलग बातें हैं। कंपनी की ओर से यह तर्क देना कि पूरी रकम एक साथ लगाने के बजाय जरूरत के हिसाब से पैसा लगाया जाता है, कमेटी को स्वीकार नहीं हुआ।

सूरक्षा ग्रुप ने क्या कहा?

JP Infratech के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर जश पंचामिया ने कमेटी की रिपोर्ट से असहमति जताई। उनका कहना था कि रिपोर्ट रेजोल्यूशन प्लान के अनुरूप नहीं है और कंपनी प्लान का पालन कर रही है। उन्होंने कहा कि समयसीमा का आकलन करने के लिए कमेटी ने सही पैमाना नहीं अपनाया। कंपनी के मुताबिक, रेजोल्यूशन प्लान में टावरों को पूरा करने की बात है, न कि हर मामले में कब्जे की पेशकश की तारीख को आधार बनाने की। कंपनी ने यह भी दावा किया कि कई मामलों में खरीदार खुद कब्जा लेने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।

कमेटी ने ट्रिब्यूनल से इन खामियों पर तत्काल ध्यान देने और प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने तथा घरों का कब्जा देने के लिए उचित निर्देश जारी करने की सिफारिश की है। सूरक्षा ग्रुप की रेजोल्यूशन योजना को लेकर कानूनी प्रक्रिया में एक अहम पड़ाव 24 मई 2024 को आया था, जब नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने योजना को मंजूरी दी। इसके तहत कंपनी को किसानों को मुआवजा देने के लिए यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) को चार साल में ₹1,335 करोड़ देने का निर्देश दिया गया था।

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