10 साल की सुस्ती के बाद बायोगैस भरेगी रफ्तार! एथनॉल की तरह अब कचरे से देश की इकोनॉमी दौड़ाने का मेगा-प्लान
सरकार एथनॉल की सफलता को बायोगैस क्षेत्र में दोहराने की तैयारी में है, जिसके तहत सिटी गैस कंपनियों के लिए सीबीजी मिश्रण अनिवार्य किया गया है। ...और पढ़ें

बायोगैस भरेगी रफ्तार!
HighLights
सरकार ने सिटी गैस कंपनियों के लिए बायोगैस मिश्रण अनिवार्य किया।
एथेनॉल की सफलता को अब बायोगैस क्षेत्र में दोहराया जाएगा।
किसानों को आय, शहरों को स्वच्छता, ऊर्जा सुरक्षा मिलेगी।
नई दिल्ली: जब आप अपनी गाड़ी में पेट्रोल भरवाते हैं, तो क्या आपको पता है कि उसमें 20% हिस्सा गन्ने या अनाज से बने 'एथेनॉल' (Ethanol) का होता है? एक वक्त था जब पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की योजना करीब 10 साल तक सरकारी फाइलों में धूल खाती रही थी। लेकिन फिर सरकार ने ऐसा गियर बदला कि भारत ने अपना लक्ष्य 5 साल पहले ही हासिल कर लिया।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ठीक इसी 'एथेनॉल मॉडल' को एक नई और कहीं ज्यादा बड़ी चीज पर लागू करने जा रही है बायोगैस (Compressed Biogas - CBG)। सवाल यह है कि जो चमत्कार गन्ने (एथेनॉल) ने किया, क्या वही कमाल अब गोबर, पराली और शहर का कचरा (बायोगैस) कर पाएगा?
10 साल की सुस्ती और फिर 5 साल पहले मिली मंजिल
बायोगैस के भविष्य को समझने के लिए पहले एथेनॉल के इतिहास को समझना होगा। शुरुआती दौर में एथेनॉल ब्लेंडिंग (मिश्रण) का प्रोग्राम बुरी तरह फ्लॉप था। न तो तेल कंपनियां इसे खरीदने को तैयार थीं और न ही किसानों को सही दाम मिल रहा था। लेकिन फिर सरकार ने स्पष्ट नीतियां बनाईं, बैंकों से आसान लोन दिलवाया और तय कीमत पर एथेनॉल खरीदने की 100% गारंटी (Off-take guarantee) दी।
इसकी नतीजा है जो 20% ब्लेंडिंग का लक्ष्य 2030 के लिए तय किया गया था, उसे भारत ने 5 साल पहले (2025-26) ही हासिल कर लिया। इससे देश के अरबों डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार (क्रूड ऑयल इम्पोर्ट) की बचत हुई है।
बायोगैस (CBG) का मौजूदा हाल
साल 2018 में सरकार ने बड़े जोर-शोर से SATAT (Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) योजना लॉन्च की थी। लक्ष्य था 2023 तक देश भर में 5,000 CBG प्लांट लगाना। लेकिन निवेशकों की कमी, कचरे की सप्लाई चेन की दिक्कत और गैस की खरीद की स्पष्ट गारंटी न होने के कारण यह योजना भी कई सालों तक रेंगती रही और अपने लक्ष्य से काफी पीछे रह गई।
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अब क्या बदला है?
जिस तरह एथेनॉल को 'अनिवार्यता' की संजीवनी मिली थी, ठीक वही बूस्टर डोज अब बायोगैस को मिल गया है। सरकार ने नियम लागू कर दिया है कि सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों को अपनी CNG (गाड़ियों की गैस) और PNG (घरों की रसोई गैस) में कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) मिलाना ही होगा। यह लक्ष्य वित्तीय वर्ष 2025-26 में 1% से शुरू होकर 2028-29 तक 5% कर दिया गया है। इस एक कड़े नियम ने पूरा गेम बदल दिया है। अब रिलायंस, अडाणी और गेल (GAIL) जैसी बड़ी कंपनियां तेजी से बायोगैस प्लांट लगा रही हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि गैस का खरीदार तैयार बैठा है।
एथेनॉल से बायोगैस तक
जानकारों का मानना है कि बायोगैस का सफर एथेनॉल से थोड़ा ज्यादा मुश्किल है। एथेनॉल के लिए गन्ने की मिलें पहले से मौजूद थीं और सप्लाई चेन सेट थी। लेकिन बायोगैस के लिए पराली, गाय का गोबर, और नगर निगम के गीले कचरे को हर दिन इकट्ठा करके प्लांट तक पहुंचाना (Supply Chain Management) बहुत ही असंगठित और मुश्किल काम है। कचरे की क्वालिटी हर जगह अलग होती है, जिससे गैस का उत्पादन प्रभावित होता है। इसके प्लांट लगाने की शुरुआती लागत भी काफी ज्यादा है।
आपको और देश को क्या होगा फायदा?
अगर बायोगैस 'एथेनॉल का कर्व' दोहराने में कामयाब हो जाती है, तो यह भारत के लिए एक 'ट्रिपल विन' (Triple Win) साबित होगा। जो किसान पराली जलाकर प्रदूषण बढ़ाते थे, वे अब उसे बायोगैस फैक्ट्रियों को बेचकर पैसे कमा रहे हैं। गोबर की कीमत मिल रही है। शहरों के बाहर बने कचरे के पहाड़ (Landfills) इस गैस के लिए कच्चे माल का काम करेंगे, जिससे शहर साफ होंगे। विदेशी LNG के आयात पर भारत की निर्भरता घटेगी, जिसका सीधा फायदा लंबी अवधि में आम उपभोक्ताओं को गैस की कीमतों में स्थिरता के रूप में मिलेगा।