चीन जमा कर रहा दुनिया का सारा सोना और तेल! क्या भारत के लिए बज चुकी खतरे की घंटी? क्या है 'सीक्रेट मिशन'?
चीन चुपचाप रिकॉर्ड गति से सोना और कच्चा तेल जमा कर रहा है, जिससे उसकी वित्तीय संप्रभुता मजबूत हो रही है और वैश्विक बाजारों पर नियंत्रण बढ़ रहा है। ...और पढ़ें
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चीन क्यों जमा कर रहा सोना और तेल?
HighLights
चीन क्यों जमा कर रहा तेल और सोना?
क्या है नई चाल?
नई दिल्ली: दुनिया भर के देश जहां आर्थिक मंदी और भू-राजनीतिक तनावों (Geo Political tension) से जूझ रहे हैं, वहीं चीन (China) बड़ी खामोशी से एक ऐसी रणनीति पर काम कर रहा है जिसने दुनियाभर के विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। चीन एक बार फिर रिकॉर्ड गति (near record pace) से दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर संसाधन सोना (Gold) और कच्चा तेल (Crude Oil) जमा कर रहा है।
सोने का अकूत भंडार
क्रिप्टो और डॉलर से इतर, चीन अपनी वित्तीय संप्रभुता (Sovereignty) को पूरी तरह से 'हैक-प्रूफ' और सुरक्षित बनाने में लगा है। पीपल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC) ने जुलाई 2026 में 6,40,000 औंस (लगभग 20 टन) सोने की भारी-भरकम खरीदारी की है, जो अक्टूबर 2023 के बाद उसकी सबसे बड़ी एकल (Single-month) वृद्धि है। यह लगातार 21वां महीना है जब चीनी केंद्रीय बैंक ने अपने आधिकारिक स्वर्ण भंडार में इजाफा किया है।
इस नई खरीदारी के साथ ही चीन के कुल आधिकारिक स्वर्ण भंडार की कीमत 306 अरब डॉलर (करीब $306 Billion) के विशाल आंकड़े को पार कर गई है। पश्चिमी देशों के वित्तीय नेटवर्क और पाबंदियों से बचने के लिए चीन लंदन में रखे अपने ऐतिहासिक सोने के स्टॉक का एक बड़ा हिस्सा हांगकांग ट्रांसफर कर रहा है, ताकि एशिया में सोने की कीमतों का एक स्वतंत्र 'प्राइसिंग हब' बनाया जा सके।
1.4 बिलियन बैरल कच्चे तेल का 'हथियार'
सिर्फ सोना ही नहीं, चीन ने कच्चे तेल (Crude Oil) का भी एक ऐसा विशालकाय भंडार तैयार कर लिया है, जिसे अब उसका सबसे बड़ा आर्थिक हथियार माना जा रहा है। रैंड (RAND) की एक नई स्टडी के मुताबिक, चीन ने अपनी रणनीतिक और एंटरप्राइज इन्वेंट्री में 1.4 अरब बैरल कच्चा तेल जमा कर लिया है। यह भंडार अमेरिका के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (Strategic Petroleum Reserve) में मौजूद 413 मिलियन बैरल से तीन गुना से भी अधिक है।
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प्राइसवाटरहाउसकूपर्स (PwC) के विशेषज्ञों के अनुसार, यह विशाल भंडार चीन को ग्लोबल मार्केट में 'प्राइम परचेजिंग पावर' (Prime Purchasing Power) देता है। इसका मतलब है कि ड्रैगन अब ओपेक (OPEC) की तरह ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को अपनी मर्जी से घटा या बढ़ा सकता है।
भारत के लिए यह खतरे की घंटी क्यों है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। ग्लोबल मार्केट में चीन का यह दबदबा भारत के लिए एक भयानक 'प्राइस शॉक' (Price Shock) साबित हो सकता है।
अगर चीन बाजार में अपना तेल उतारता है या भारी मात्रा में अचानक खरीदता है, तो कीमतों में बेतहाशा उतार-चढ़ाव आ सकता है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने का सीधा मतलब है कि भारत का आयात बिल बढ़ेगा, रुपया कमजोर होगा और ट्रांसपोर्टेशन से लेकर खाद (Fertilizers) तक हर चीज आम आदमी के लिए महंगी हो जाएगी।
चीन की क्षमता है कि वह भारी मात्रा में डिस्काउंटेड रूसी और ईरानी तेल खरीद सकता है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों के लिए कॉम्पीटीशन बढ़ेगा और उन्हें मिलने वाला डिस्काउंट कम हो जाएगा।
चीन की यह 'खामोश लेकिन आक्रामक' रणनीति साफ इशारा कर रही है कि वह भविष्य के किसी भी बड़े वैश्विक संकट के लिए खुद को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना रहा है।
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