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    बगहा में सुमन की जिंदगी पर भारी पड़ा रास्ता, प्रसव पीड़ा में नदी के बीच फंसा ट्रैक्टर, मौत

    By Amit ShuklaEdited By: Dharmendra Singh
    Updated: Mon, 10 Aug 2026 01:22 PM (IST)

    बगहा के सिंगड़हवा दोन में सड़क न होने के कारण प्रसव पीड़ा से जूझ रही 22 वर्षीय सुमन देवी की ट्रैक्टर से अस्पताल ले जाते समय हरहा नदी में फंसने से मौत ...और पढ़ें

    इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

    इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

    HighLights

    1. प्रसव पीड़ा में अस्पताल ले जाते समय महिला की मौत।

    2. सड़क न होने से ट्रैक्टर हरहा नदी में फंसा।

    3. ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी उजागर।

    जागरण संवाददाता, बगहा (पश्चिम चंपारण)। बगहा के गोबरहिया थाना क्षेत्र के सिंगड़हवा दोन की 22 वर्षीय सुमन देवी के लिए रविवार की शाम जिंदगी की सबसे कठिन घड़ी थी। वह प्रसव पीड़ा से कराह रही थी। परिवार उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए परेशान था। गांव में सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचने का रास्ता भी नहीं था। आखिरकार स्वजन उसे ट्रैक्टर से हरनाटांड़ पीएचसी ले जाने को मजबूर हुए। रास्ते में हरहा नदी में ट्रैक्टर फंस गया। उसे निकालने में समय बीतता गया और प्रसव पीड़ा से जूझती सुमन की मौत हो गई।

    दर्द से कराहती रही सुमन

    सिंगड़हवा दोन निवासी प्रकाश उरांव की पुत्री सुमन देवी गर्भवती थी। रविवार देर शाम उसे तेज प्रसव पीड़ा हुई। परिवार के लोग उसे इलाज के लिए हरनाटांड़ पीएचसी ले जाने की तैयारी में जुट गए। उस समय परिवार के सामने सबसे बड़ी चिंता सुमन को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाने की थी। गांव से बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता नहीं होने के कारण ट्रैक्टर ही सहारा बना।

    नदी में फंस गया ट्रैक्टर

    हरनाटांड़ जाने के क्रम में दोन इलाके में ही हरहा नदी में ट्रैक्टर फंस गया। प्रसव पीड़ा से परेशान सुमन ट्रैक्टर पर थी। परिवार की बेचैनी बढ़ती गई। ट्रैक्टर को नदी से निकालने में समय लगा। अस्पताल की दूरी हर गुजरते पल के साथ सुमन की पीड़ा बढ़ाती रही। जिस समय उसे चिकित्सकीय सहायता मिलनी चाहिए थी, उस समय परिवार नदी के बीच फंसा हुआ था।

    सड़क होती तो शायद नहीं होती यह मजबूरी

    सिंगड़हवा दोन के लोगों के लिए हरहा नदी से होकर आवागमन करना मजबूरी है। गांव में सड़क की सुविधा नहीं है। इसी कारण बीमार लोगों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को भी जोखिम उठाकर नदी पार करनी पड़ती है। सुमन की मौत ने गांव की इस पुरानी पीड़ा को फिर सामने ला दिया है।

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    एंबुलेंस के बजाय ट्रैक्टर बना सहारा

    गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस जैसी जरूरी सुविधा नहीं मिल सकी। परिवार को ट्रैक्टर का सहारा लेना पड़ा। प्रसव जैसी आपात स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने में हुई देरी कितनी भारी पड़ सकती है, सुमन की मौत इसका दर्दनाक उदाहरण है।

    अस्पताल की दूरी भी बनी दर्द

    हरनाटांड़ का अस्पताल सुमन के लिए बहुत दूर साबित हुआ। रास्ते की दुश्वारियां, नदी और ट्रैक्टर के फंसने ने इस दूरी को और पीड़ादायक बना दिया। एक ओर प्रसव पीड़ा से जूझती महिला की जिंदगी बचाने की कोशिश थी, दूसरी ओर रास्ते की ऐसी बाधाएं थीं, जिन्हें परिवार अपने दम पर पार नहीं कर सका। सुमन की मौत केवल एक परिवार का दुख नहीं है। यह उस गांव की पीड़ा भी है, जहां आज भी सड़क और स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंच जिंदगी और मौत के बीच का अंतर तय कर सकती है।