Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    नई दिल्ली से दुनिया तक पहुंची पीड़िया कला; GI टैग से मिला नया सम्मान, भोजपुरी संस्कृति की बड़ी उपलब्धि

    Updated: Wed, 17 Jun 2026 08:45 AM (GMT+05:30)

    भोजपुरी अंचल की प्राचीन लोककला पीड़िया पेंटिंग को भारत सरकार द्वारा जीआई टैग मिला है, जो भोजपुरी संस्कृति के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इससे कला को राष्ट ...और पढ़ें

    पीड़‍िया चित्र बनातीं लोक कलाकार। जागरण

    पीड़‍िया चित्र बनातीं लोक कलाकार। जागरण

    HighLights

    1. पीड़िया पेंटिंग को भारत सरकार से जीआई टैग मिला।

    2. यह भोजपुरी संस्कृति और विरासत के लिए बड़ा सम्मान है।

    3. स्थानीय कलाकारों को वैश्विक पहचान और रोजगार के अवसर मिलेंगे।

    प्रमोद टैगोर, संझौली (रोहतास)। भोजपुरी अंचल की अत्यंत प्राचीन लोककला पीड़िया पेंटिंग को भारत सरकार द्वारा भौगोलिक संकेतक, जीआई टैग (GI Tag) मिलना एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

    पीड़िया पेंटिंग को जीआई टैग मिलना, सिर्फ भोजपुरी के एक कला शैली नहीं, बल्कि भोजपुरी अस्मिता, लोक परंपरा और भोजपुरी विरासत का एक बड़ा सम्मान है।

    जीआई टैग होने से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। रोहतास के भोजपुरी चित्रकारों का कहना है कि जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया में आरा की सांस्कृतिक संस्था सर्जना न्यास की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

    इस उपलब्धि से पारंपरिक लोक कला के संरक्षण के साथ अब स्थानीय कलाकारों की कलाकृतियों की वैश्विक पहचान भी मिलेगी। रोजगार और आय के नए अवसर सृजित होंगे। 

    भोजपुरी अंचल की पारंपरिक लोककला है पीड़िया

    पीड़िया भोजपुरी अंचल की पुरानी और बेहद महत्वपूर्ण पारंपरिक लोककला और भित्ति चित्र है। पीड़िया त्याहार भी है, जो भाई-बहन के अटूट प्रेम और पारिवारिक संबंधों का प्रतीक मानी जाती है।

    यह परंपरा गोवर्धन पूजा में गोधन कुटने के दिन से शुरू होकर एक महीने तक चलती है। गांव की लड़कियां व महिलाएं विशेष स्थान ( गौशाला, दालान, कोहबर, घर की दीवारों ) पर पीड़‍िया उकेरती हैं। 

    गोबर, रंगनी के कांटे (टुंगल) व प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके लोक संस्कृति, प्रकृति और सामाजिक जीवन की झलक को उतारा जाता है। वे पारंपरिक गीत गाती हैं। 

    पहली बार रोहतास की बेटी ने दिलाया था पीड़िया को राष्ट्रीय पहचान

    रोहतास के दिनारा की बेटी और दावथ के डेढगांव की बहु विनीता ने हाल ही में शिल्प संग्रहालय, नई दिल्ली के मुख्य दरवाजे पर 10 फीट लंबा व छह फीट चौड़ा इस पीड़िया का भित्ति चित्र उकेर राष्ट्रीय पहचान दिलाई थी।

    उस समय इस भोजपुरी लोककला की उपस्थिति पहली बार देश की राजधानी में हुई थी।

    कहते है भोजपुरी कलाकार

    भोजपुरी अंचल की प्राचीन और अद्वितीय लोक चित्रकला से समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने और स्थानीय कलाकारों की आय बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इससे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
    कौशलेश पांडेय, चित्रकार, भोजपुरी कला ( बिक्रमगंज)


    पीढ़ियों से चली आ रही इस कला को बनाने में महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। भित्ति चित्र में संस्कृति और परंपराओं की कहानी को सदियों से गढ़ती आ रही है। इसे और समृद्ध बनाने में महिलाओं को और आगे आने की जरूरत है।

    विनीता कुमारी, राष्ट्रीय चित्रकार, डेढ़गांव, दावथ

    यह भी पढ़ें- नालंदा की बावन बूटी से भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग तक; बिहार की तीन पारंपरिक कलाओं को मिला GI टैग