Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    टिकट नहीं मिला तो जमींदार ने खोल दिया अपना सिनेमा हॉल; रोचक है पटना की कहानी

    Updated: Sun, 31 May 2026 09:27 AM (IST)

    पटना सिटी के आनंद टॉकीज की कहानी 1931 से शुरू होती है, जब टिकट न मिलने पर बेनी प्रसाद गुप्ता ने इसे बनवाया। यह हॉल कभी छह आने में मनोरंजन का बड़ा साधन ...और पढ़ें

    पटना सिटी के खाजेकलां स्‍थ‍ित कृष्‍णा टॉकीज। फाइल

    पटना सिटी के खाजेकलां स्‍थ‍ित कृष्‍णा टॉकीज। फाइल

    HighLights

    1. बेनी प्रसाद गुप्ता ने 1933 में आनंद टॉकीज बनवाया।

    2. छह आने में मिलता था पूरे परिवार का मनोरंजन।

    3. शोले-बॉबी के लिए सुबह 5 बजे से लगती थी कतार।

    अनिल कुमार, पटना सिटी। आज जब मल्टीप्लेक्स में एक फिल्म देखने के लिए सैकड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, तब यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि कभी छह आने का टिकट लोगों के मनोरंजन का  बड़ा माध्यम हुआ करता था।

    उस दौर में सिनेमा देखना केवल फिल्म देखना नहीं, बल्कि पूरे परिवार का उत्सव और पिकनिक हुआ करता था। पटना सिटी की आनंद टाकीज और कृष्णा टाॅकीज इस सुनहरे दौर की आज भी गवाह हैं।

    जब टिकट नहीं मिला तो खोल दिया अपना सिनेमा हॉल

    कहानी वर्ष 1931 से शुरू होती है। 14 मार्च 1931 को भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा पटना के एकमात्र सिनेमा हॉल एलि‍फिंस्टन में प्रदर्शित हुई थी।

    बेलवरगंज के जमींदार बेनी प्रसाद गुप्ता भी यह ऐतिहासिक फिल्म देखने पहुंचे, लेकिन भारी भीड़ के कारण उन्हें टिकट नहीं मिल सका।

    उनके लोगों ने काफी प्रयास किया, यहां तक कि ब्लैक में भी टिकट तलाशा गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। गेटकीपर ने बिना टिकट प्रवेश देने से साफ इनकार कर दिया।

    इस घटना ने बेनी प्रसाद गुप्ता को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उसी समय पटना सिटी में अपना सिनेमा हॉल बनाने का निर्णय ले लिया।

    परिणामस्वरूप वर्ष 1933 में महज 750 रुपये की लागत से करकट का बना आनंद टाॅकीज अस्तित्व में आया। संयोग देखिए कि इस हॉल में भी पहली प्रदर्शित फिल्म आलम आरा ही बनी।

    उद्घाटन शो में बेनी प्रसाद गुप्ता अपने परिजनों और शुभचिंतकों के साथ बैठे और वह फिल्म देखी, जिसने उन्हें सिनेमा हॉल बनाने की प्रेरणा दी थी।

    बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) अशोक कुमार गुप्‍ता हैं कि उनके परदादा का यह जुनून उस समय पटना से मुंबई तक चर्चा का विषय बन गया था।

    Film books

    (सिनेमा हॉल के काउंटर पर ऐसे सजती थीं फिल्‍मों की क‍िताबें।)

    छह आने में मिलता था मनोरंजन का खजाना

    शुरुआती वर्षों में आनंद टाकीज की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। दर्शकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए आजादी के बाद वर्ष 1950 में लगभग पांच हजार रुपये की लागत से बेलवरगंज स्थित अशोक राजपथ पर ईंट और सीमेंट से स्थायी भवन का निर्माण कराया गया।

    उस दौर में सिनेमा का टिकट छह, नौ और बारह आने में मिल जाता था। आम लोग 40 पैसे का टिकट लेकर लकड़ी की बेंच पर बैठकर फिल्म का आनंद लेते थे। इंटरवल में समोसा, जलेबी और अन्य नाश्ते भी बेहद सस्ते दामों पर उपलब्ध होते थे।

    बैलगाड़ी बन जाती थी चलती-फिरती पिकनिक

    85 वर्षीय साहित्यकार नवीन रस्‍तोगी बताते हैं कि शुक्रवार को नई फिल्म लगते ही आसपास के गांवों में इसकी खबर फैल जाती थी।

    मसौढ़ी, धनरूआ, फतुहा, खुसरूपुर, बख्तियारपुर और अगमकुआं सहित दूर-दराज के इलाकों से लोग फिल्म देखने की योजना बनाते थे।

    रविवार की सुबह चार-पांच परिवार मिलकर बैलगाड़ी तैयार करते थे। उसमें दरी, चादर, लाई-चना, सत्तू और गुड़ रखा जाता था।

    बच्चे नए कपड़े पहनकर सबसे आगे बैठते और रास्ते भर गाने गाते हुए सिनेमा हॉल तक पहुंचते थे। आनंद टाकीज और कृष्णा टाकीज के पास बने खुले मैदानों में बैलगाड़ियां खड़ी कर दी जाती थीं।

    दोपहर का शो देखने के बाद लोग शाम होने से पहले गांव लौट जाते थे। वह सफर किसी धार्मिक मेले या बरात से कम नहीं होता था।

    इंटरवल में टिकट बेचकर घर लौट जाते थे बच्चे

    नवीन रस्तोगी मुस्कुराते हुए बताते हैं कि कई बार घरवालों के डर से वे पूरी फिल्म भी नहीं देख पाते थे। इंटरवल तक फिल्म देखकर तीन आने में टिकट किसी और को बेच देते और घर लौट जाते थे।

    खबरें और भी

    अगर जेब में एक-दो रुपये ज्यादा होते, तो समोसा-जलेबी का भी आनंद उठा लेते थे। फिल्मों की कहानी और गीतों की छोटी-छोटी किताबें 50 पैसे में मिलती थीं, जिन्हें लोग बड़े चाव से खरीदकर घर ले जाते थे।

    शोले और बॉबी के समय उमड़ पड़ती थी भीड़

    पटना सिटी निवासी और फिल्म निर्देशक Prakash Sinha बताते हैं कि जब शोले, बॉबी और जय संतोषी मां जैसी फिल्में कृष्णा टाॅकीज में लगी थीं, तब दर्शकों की लंबी कतारें सिनेमा हॉल से निकलकर अशोक राजपथ तक पहुंच जाती थीं।

    टिकट खिड़की सुबह आठ बजे खुलती थी, लेकिन लोग तड़के पांच बजे से ही लाइन लगाना शुरू कर देते थे। कई बार टिकट ब्लैक में दोगुने और तिगुने दामों पर बिकते थे।

    समय बदला, लेकिन यादें नहीं

    समय के साथ मनोरंजन के साधन बदल गए। मल्टीप्लेक्स, ओटीटी और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में पुराने सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल दर्शकों की कमी से जूझने लगे। वर्ष 2011 में आनंद टाॅकीज का संचालन बंद हो गया।

    हालांकि कृष्णा टाकीज आज भी अपनी पहचान बचाए हुए है। सीमित दर्शकों के बावजूद यह हॉल चल रहा है और यहां टू-डी तथा थ्री-डी दोनों स्क्रीन की सुविधा उपलब्ध है। नई फिल्में रिलीज होते ही यहां प्रदर्शित की जाती हैं।

    पटना सिटी के बुजुर्गों के लिए यह केवल सिनेमा हॉल नहीं, बल्कि यादों का खजाना है। वह दौर जब छह आने का टिकट खुशियां खरीद लेता था, बैलगाड़ी सफर का साथी होती थी और सिनेमा पूरे परिवार के लिए एक यादगार उत्सव बन जाता था।