लल्लू मुखिया को पटना हाईकोर्ट से क्यों नहीं मिली राहत? 74 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने बताया पूरा कारण
कर्णवीर सिंह यादव उर्फ लल्लू मुखिया को पटना हाईकोर्ट से बिहार कंट्रोल ऑफ क्राइम्स एक्ट (बीसीसीए) के तहत निवारक हिरासत में राहत नहीं मिली। कोर्ट ने 74 ...और पढ़ें

पटना हाईकोर्ट
HighLights
लल्लू मुखिया को पटना हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत।
बीसीसीए के तहत निवारक हिरासत आदेश बरकरार रखा गया।
कोर्ट ने 74 पन्नों के फैसले में याचिका खारिज की।
विधि संवाददाता, पटना। बिहार कंट्रोल ऑफ क्राइम्स एक्ट (बीसीसीए), 2024 के तहत निवारक हिरासत में रखे गए कर्णवीर सिंह यादव उर्फ लल्लू मुखिया को पटना हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। न्यायाधीश बिबेक चौधरी और न्यायाधीश राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने उनकी आपराधिक रिट याचिका खारिज करते हुए निरोध आदेश को बरकरार रखा।
कोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक और बाद के निरोध आदेश में ऐसा कोई क्षेत्राधिकार संबंधी दोष, प्रक्रियात्मक अवैधता या संवैधानिक खामी नहीं है, जिसके आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप किया जाए।
डीएम के आदेश के बाद भागलपुर जेल में रखा गया
मामले में बाढ़ के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी ने पांच दिसंबर 2025 को कर्णवीर सिंह यादव के खिलाफ बीसीसीए के तहत कार्रवाई की अनुशंसा की थी।
इसके आधार पर पटना के जिलाधिकारी ने 10 दिसंबर 2025 को बीसीसीए केस संख्या 1-09/2025 में अधिनियम की धारा 12(2) के तहत निरोध आदेश पारित किया।
इसके बाद उन्हें भागलपुर सेंट्रल जेल में रखा गया। राज्य सरकार ने सलाहकार बोर्ड की राय के बाद 11 दिसंबर 2025 से 10 जून 2026 तक निरोध की पुष्टि की।
याचिका में कहा- मामले सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जिन मामलों और घटनाओं को निरोध का आधार बनाया गया है, वे सामान्य कानून-व्यवस्था से जुड़े हैं।
उनका प्रभाव इतना व्यापक नहीं है कि उन्हें सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा माना जाए। यह भी तर्क दिया गया कि सामान्य आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती थी, इसके बावजूद निवारक हिरासत का सहारा लिया गया।
सरकार बोली- गतिविधियों से लोगों में पैदा हुआ भय
राज्य की ओर से महाधिवक्ता एसडी संजय ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता की आपराधिक गतिविधियों से स्थानीय लोगों में भय और असुरक्षा की भावना पैदा हुई।
इससे सार्वजनिक जीवन की सामान्य गति भी प्रभावित हुई। सरकार ने यह भी दलील दी कि बाद का निरोध आदेश पहले आदेश की महज पुनरावृत्ति नहीं था।
बाद के आदेश में नए तथ्य और अतिरिक्त आरोप-पत्र
राज्य की ओर से कहा गया कि बाद के निरोध आदेश के पीछे नए और स्वतंत्र तथ्य मौजूद थे। इनमें अतिरिक्त आरोप-पत्र भी शामिल थे।
सरकार के अनुसार इन तथ्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार करने के बाद नया निरोध आदेश पारित किया गया। इसलिए केवल इस आधार पर उसे अवैध नहीं माना जा सकता कि इससे पहले भी निरोध आदेश पारित हो चुका था।
हर निरोध आदेश को उसके समय की सामग्री पर परखा जाएगा
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक निरोध आदेश की वैधता उस समय उपलब्ध सामग्री और सक्षम प्राधिकारी की दर्ज वैधानिक संतुष्टि के आधार पर तय की जानी है।
नए और प्रासंगिक तथ्यों पर स्वतंत्र विचार के बाद पारित बाद का निरोध आदेश सिर्फ इसलिए अवैध नहीं हो जाता कि पहले भी निरोध आदेश पारित हुआ था। कोर्ट ने इसी आधार पर याचिकाकर्ता की आपत्ति को स्वीकार नहीं किया।
'एंटी-सोशल एलिमेंट' मानने की कार्रवाई सही
खंडपीठ ने कर्णवीर सिंह यादव को बीसीसीए की धारा 2(बी) के तहत 'एंटी-सोशल एलिमेंट' मानने की कार्रवाई को भी सही ठहराया।
कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ उपलब्ध सामग्री के आधार पर सक्षम प्राधिकारी ने निरोध की कार्रवाई की थी। इस प्रक्रिया में ऐसा कोई अधिकार क्षेत्र संबंधी दोष नहीं मिला, जिससे आदेश को रद किया जा सके।
अभ्यावेदन पर भी संवैधानिक प्रावधानों के तहत हुआ विचार
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर संविधान के अनुच्छेद 22(5) और संबंधित वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप विचार किया गया।
कोर्ट के मुताबिक रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन हुआ है। इसलिए इस आधार पर भी निरोध आदेश में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बना।
74 पन्नों के फैसले में रिट याचिका खारिज
खंडपीठ ने अपने 74 पृष्ठों के फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता की किसी भी चुनौती से निरोध आदेशों में क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि, प्रक्रियात्मक अवैधता या संवैधानिक सुरक्षा के उल्लंघन का आधार सामने नहीं आया।
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इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आपराधिक रिट याचिका खारिज कर दी और लल्लू मुखिया को बीसीसीए के तहत मिली निवारक हिरासत से राहत नहीं दी।
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