Bihar News : फांसी की सजा सुन जिस कठघरे में मुस्कुराते रहे खुदीराम, वह टुकड़ों में बदहाल
खुदीराम बोस के ऐतिहासिक मुकदमे का कठघरा, जहां उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी, आज मुजफ्फरपुर में बदहाल स्थिति में है। शोधार्थी और संगठन इस धरोहर को सं ...और पढ़ें

जिला खनन कार्यालय में रखा कठघरे का विभिन्न हिस्सा। यहीं हुई थी खुदीराम के मुकदमे की सुनवाई। जागरण
प्रेम शंकर मिश्रा, मुजफ्फरपुर । छोटी उम्र में स्वतंत्रता के जुनूनी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी की हिम्मत की चर्चा बंगाल (तब बिहार भी बंगाल का हिस्सा था) ही नहीं पूरे देश में हो रही थी। चाकी ने खुद को बलिदान कर दिया था। अब देश की नजर खुदीराम के मुकदमे पर थी।
एक मई, 1908 को उनकी गिरफ्तारी के बाद 21 मई को मामले की सुनवाई कार्नडाफ की अदालत में शुरू हुई। खुदीराम के लिए अधिवक्ता कालिदास बसु, उपेंद्रनाथ सेन और क्षेत्रनाथ बंदोपाध्याय ने बिना फीस केस लड़ा। बाद में कलकमाल सेन, नागेंद्र लाल लाहिड़ी और सतीश चंद्र चक्रवर्ती भी टीम में शामिल हो गए। ब्रिटिश सरकार की तरफ से मुनमुन और बिनोद बिहारी मजूमदार अभियोजक थे।
जिस जगह इस मुकदमे की सुनवाई हुई थी, वहां अभी मुजफ्फरपुर का जिला खनन कार्यालय चल रहा। इसी भवन में जिला लोक शिकायत कार्यालय भी है। मुकदमे की सुनवाई के दौरान जिस कठघरे (विटनेस बाक्स) में खुदीराम खड़े होते थे, उसे हम संजो नहीं सके। 13 जून, 1908 को जज ने फांसी की सजा सुनाई।
सजा सुन खुदीराम मुस्कुराए तो जज ने पूछा, फांसी का अर्थ जानते हो। खुदीराम ने फिर मुस्कुराते हुए जवाब दिया, बिल्कुल जानता हूं। जज ने अंतिम इच्छा पूछी तो बलिदानी ने फिर मुस्कुराते हुए यही कहा, अगर थोड़ा समय हो तो आपको भी बम बनाना सिखा दूंगा। इस वाक्य के साथ खुदीराम को कठघरे से बाहर ले जाया गया।
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यह कठघरा आज अलग-अलग टुकड़ों में बंटा खनन कार्यालय के एक कोने में पड़ा है। इस धरोहर को हम नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बना सकते थे, मगर यह नष्ट हो रहा है।
बलिदानी खुदीराम बोस पर शोध करने वाले कई शोधार्थी और संगठन इसे संरक्षित करने और जगह को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग कर रहे हैं। अमर बलिदानी से जुड़ी जगह और वस्तु को लेकर शासन-प्रशासन की संवेदना जगने का उन्हें इंतजार है।

पोशाक और जूते बन गए साक्ष्य
खुदीराम पर शोध करने वाले सचिन चक्रवर्ती कहते हैं, उनकी पहचान, पोशाक और जूते से भी की गई। शिनाख्त तहसीलदार फैजुद्दीन ने की थी। उसने घटना के समय उन्हें देखा था।
बम फेंकने के बाद खुदीराम व प्रफुल्ल चाकी ने अपने जूते वहीं छोड़ दिए थे। शिनाख्त के दौरान चाकी के मृत शरीर व खुदीराम के पैर में ये जूते फिट बैठ गए। यह उनके खिलाफ साक्ष्य बन गया।
चाकी की पुख्ता पहचान के लिए अंग्रेजों ने क्रूरता का परिचय दिया। उनके सिर को काटकर कोलकाता तक भेजा गया। निचली अदालत में डेढ़ माह से भी कम समय में मुकदमे की सुनवाई पूरी हो गई।
हाईकोर्ट में अपील के लिए महज सात दिनों का समय दिया गया। खुदीराम हाईकोर्ट में अपील नहीं करना चाहते थे। उन्हें समझाया गया कि अगर यहां उम्र कैद की सजा होती है तो देश की सेवा का मौका मिलेगा। इसके बाद वे अपील के लिए तैयार हुए, मगर यहां भी निचली अदालत के फैसला कायम रहा।
- 13 जून, 1908 को जिला जज ने सुनाई थी सजा, जहां बलिदानी का चला मुकदमा, वहां जिला खनन कार्यालय
- कठघरा भी कई टुकड़ों में बंटा, उसे भी कार्यालय के एक कोने में रख दिया गया, उठ रही बचाने की मांग
- बम धमाके के बाद भागने के दौरान छूट गया था खुदीराम का जूता, वह भी उनके खिलाफ बन गया साक्ष्य