चुनाव चिह्न विवाद में तेजस्वी और मुकेश सहनी की बढ़ी मुश्किलें, मुजफ्फरपुर कोर्ट ने दिया दोबारा सुनवाई का आदेश
Bihar Politics News: तेजस्वी यादव, मुकेश सहनी और संतोष सहनी को चुनाव चिह्न 'नाव' के कथित दुरुपयोग मामले में मुजफ्फरपुर ...और पढ़ें

तेजस्वी प्रसाद यादव व मुकेश सहनी। फाइल फोटो
HighLights
तेजस्वी यादव, मुकेश सहनी पर चुनाव चिह्न दुरुपयोग मामले में सुनवाई।
मुजफ्फरपुर कोर्ट ने सीजेएम कोर्ट का याचिका खारिज करने का आदेश रद्द किया।
परिवादी सुधीर ओझा का बयान 29 अक्टूबर को दर्ज होगा।
जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर। Tejashwi Yadav Court Case: चुनाव चिह्न नाव के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामले में बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव, विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी और संतोष सहनी की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-11 डॉ. किशोर कुणाल की अदालत ने सीजेएम कोर्ट द्वारा परिवाद याचिका खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया है।
पुनरीक्षण याचिका स्वीकार
निचली अदालत को प्रेषित मामला सत्र अदालत ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए निचली अदालत को भेज दिया है।
यह मामला भारतीय सार्थक पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष सुधीर कुमार ओझा द्वारा दर्ज कराए गए परिवाद से संबंधित है। परिवादी का आरोप है कि निर्वाचन आयोग द्वारा उनकी पार्टी को 'नाव' चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।
नाव प्रतीक के दुरुपयोग का आरोप
आरोप है कि आरोपित नेताओं ने महागठबंधन के कार्यक्रमों, बैनर और पोस्टरों में इस प्रतीक का गलत इस्तेमाल किया।
31 मार्च 2024 को इस प्रतीक का इस्तेमाल करते हुए कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिससे परिवादी की पार्टी को वित्तीय एवं राजनीतिक नुकसान हुआ। पूर्व में सीजेएम कोर्ट ने 20 जनवरी 2025 को यह परिवाद खारिज कर दिया था।
29 अक्टूबर को बयान होगा दर्ज
अदालत के फैसले को सुधीर कुमार ओझा ने अपने अधिवक्ता अरुण कुमार गुप्ता के माध्यम से जिला अदालत में चुनौती दी थी। सत्र अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता का शपथ पर बयान दर्ज करना अनिवार्य है। इसके साथ ही परिवादी सुधीर कुमार ओझा को अपना बयान दर्ज कराने के लिए 29 अक्टूबर को उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।
MP-MLA कोर्ट में भेजने का निर्देश
सत्र न्यायालय ने निर्देश दिया है कि सर्वप्रथम यह जांच की जाए कि आरोपितों में से कोई वर्तमान या पूर्व सांसद या विधायक तो नहीं है, ताकि मामला एमपी-एमएलए कोर्ट को भेजा जा सके।
यदि मामला एमपी-एमएलए कोर्ट के अधीन नहीं आता है, तो निचली अदालत को प्रक्रिया तीन माह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया गया है।
