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    Muzaffarpur News : 9 जून को हटाए गए, 9 जुलाई को फिर थानेदार... आखिर एक महीने में क्या बदल गया?

    By Keshav KumarEdited By: Dharmendra Singh
    Updated: Thu, 09 Jul 2026 11:16 AM (IST)

    मुजफ्फरपुर में गंभीर लापरवाही के आरोप में हटाए गए एक पुलिस निरीक्षक को एक महीने के भीतर ही फिर से थानेदार बना दिया गया है, जिससे पुलिस प्रशासन की कार् ...और पढ़ें

    थानेदार का महज एक महीने में ही सारे दाग धूल गए। ,

    थानेदार का महज एक महीने में ही सारे दाग धूल गए। ,

    जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर । पुलिस महकमे में जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। अब महज एक महीने के भीतर जारी दो आधिकारिक आदेशों ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर नई बहस छेड़ दी है।

    जिस पुलिस निरीक्षक को गंभीर लापरवाही के आरोप में थाने से हटाकर पुलिस केंद्र भेजा गया था, उसे फिर से थाने की कमान सौंप दी गई है।

    9 जून को हटाया गया था थाना प्रभार

    9 जून 2026 को एसएसपी कार्यालय के आदेश से तत्कालीन मीनापुर थानाध्यक्ष रामएकबाल प्रसाद को तत्काल प्रभाव से पुलिस केंद्र भेज दिया गया था।

    आदेश में उनके खिलाफ अनुसंधान में लापरवाही, दोहरे हत्याकांड की जांच में शिथिलता, गंभीर मामलों के निष्पादन में देरी, एफएसएल टीम नहीं बुलाने, अभिलेख व डेटा प्रबंधन में लापरवाही और स्पष्टीकरण का जवाब नहीं देने जैसे आरोप दर्ज थे।

    विभागीय कार्रवाई की भी हुई थी अनुशंसा

    ग्रामीण एसपी और एसडीपीओ पूर्वी-1 की रिपोर्ट के आधार पर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई चलाने की अनुशंसा की गई थी। सक्षम प्राधिकार की स्वीकृति मिलने के बाद उन्हें मीनापुर थाना से हटाकर पुलिस केंद्र भेजा गया। उस समय इसे लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई माना गया था।

    एक महीने बाद फिर मिली थाना कमान

    9 जुलाई 2026 को जारी नए आदेश में रामएकबाल प्रसाद को करजा थाना का नया थानाध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। आदेश में कार्यकुशलता, कार्यहित, लोकहित और रिक्ति को आधार बताते हुए उनकी पोस्टिंग की गई। करजा के तत्कालीन थानाध्यक्ष रामकृष्ण परमहंस के विशेष शाखा में स्थानांतरण के बाद यह पद खाली हुआ था।

    सबसे बड़ा सवाल-आखिर क्या बदल गया?

    यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि एक महीने पहले गंभीर आरोपों के आधार पर उन्हें हटाया गया था और विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा हुई थी, तो आखिर ऐसा क्या बदला कि उन्हें फिर से किसी थाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई? क्या विभागीय जांच पूरी हो गई, या जांच लंबित रहते हुए ही नई पोस्टिंग दी गई?

    नए आदेश में जांच का कोई जिक्र नहीं

    ध्यान देने वाली बात यह है कि 9 जून के आदेश में विभागीय कार्रवाई का स्पष्ट उल्लेख था, जबकि 9 जुलाई के नए आदेश में जांच या उसकी स्थिति का कोई उल्लेख नहीं किया गया। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि जांच पूरी हुई या फिर उसे लंबित रखते हुए नई जिम्मेदारी दे दी गई।

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    पुलिस महकमे में भी चर्चा तेज

    इस फैसले को लेकर पुलिस महकमे के भीतर भी चर्चाओं का दौर जारी है। कई अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि आरोप सही थे तो जांच पूरी होने से पहले थाना प्रभार देना कैसे उचित माना गया। वहीं यदि आरोप सही नहीं थे, तो एक महीने पहले इतनी सख्त कार्रवाई क्यों की गई?

    विश्वसनीयता पर भी उठे सवाल

    यह मामला केवल एक अधिकारी की पोस्टिंग तक सीमित नहीं है। इससे पुलिस प्रशासन की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। आम जनता निष्पक्ष और समान कार्रवाई की अपेक्षा करती है, लेकिन एक ही अधिकारी को लेकर एक महीने के भीतर दो अलग-अलग संदेश देने वाले आदेशों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

    स्पष्ट जवाब का इंतजार

    अब जरूरत इस बात की है कि पुलिस प्रशासन आधिकारिक रूप से स्पष्ट करे कि विभागीय जांच पूरी हो चुकी है या अभी भी जारी है।

    यदि अधिकारी को क्लीन चिट मिली है तो इसकी जानकारी सार्वजनिक की जाए, और यदि जांच लंबित है तो नई फील्ड पोस्टिंग का आधार भी स्पष्ट किया जाए। फिलहाल पूरे मामले को लेकर पुलिस महकमे से लेकर आम लोगों तक चर्चा का माहौल बना हुआ है।