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    रोहू, कतला और मृगल के पालन में नवाचार से मधुबनी के मछुआरों को मिलेगा समृद्धि का नया रास्ता

    Updated: Thu, 21 May 2026 04:48 PM (IST)

    Fish Farming Innovation: झंझारपुर में आयोजित तृतीय डॉ. राजीव स्मृति व्याख्यान में मत्स्य पालन में नवाचार और मछुआरा समुदाय के सशक्तिकरण पर चर्चा हुई। आ ...और पढ़ें

    ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाने में मछली से मिल रही मदद। फाइल फोटो

    ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाने में मछली से मिल रही मदद। फाइल फोटो

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    संवाद सहयोगी, झंझारपुर (मधुबनी)। Madhubani Fish Farming: मछुआरा समुदाय की आर्थिक मजबूती, जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और आधुनिक तकनीक आधारित मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से झंझारपुर के एक निजी होटल में तृतीय डॉ. राजीव स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया।

    सखी संस्था एवं मानवाधिकार संघ, बिहार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस व्याख्यान का मुख्य विषय “मत्स्य पालन में नवाचार: मछुआरा समुदाय को सशक्त बनाना, जीवन को समृद्ध बनाना” था। कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ।

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    सखी संस्था की सचिव सुमन सिंह ने अतिथियों, वक्ताओं और सहकारी समितियों के प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. राजीव रंजन कुमार सिंह का सपना ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाना था, जिसे संस्था जनहित कार्यक्रमों के माध्यम से आगे बढ़ा रही है।

    कार्यक्रम में प्रो. अनिल प्रसाद ने मानवाधिकार संरक्षण का संकल्प दिलाया, जबकि अशोक प्रसाद ने डॉ. राजीव के सामाजिक सरोकारों को याद किया।

    आधुनिक तकनीकों से बढ़ेगी आय

    मुख्य वक्ता डॉ. जनार्दन ने “जलीय संपदा से समृद्धि: तकनीकी नवाचार और जलकृषि का बदलता परिदृश्य” विषय पर बोलते हुए आधुनिक मत्स्य पालन, मांगुर उत्पादन और जलाशयों के वैज्ञानिक प्रबंधन को ग्रामीण आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बताया।

    उन्होंने कहा कि नई तकनीकों को अपनाकर मछुआरे अपनी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। वहीं, प्रो. विद्यानाथ झा ने मखाना खेती को मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बताते हुए इसके संरक्षण पर बल दिया।

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    लागत, मुनाफा और जरूरी योग्यता

    मत्स्य पालन आजकल कृषि क्षेत्र में सबसे मुनाफेदार व्यवसायों में से एक बनकर उभरा है। कम लागत में बेहतर प्रबंधन के जरिए इससे बेहतरीन कमाई की जा सकती है। इससे जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित हैं:

    सबसे लाभकारी मछलियों की किस्में

    व्यावसायिक रूप से उन मछलियों का पालन सबसे फायदेमंद माना जाता है जो तेजी से बढ़ती हैं और बाजार में जिनकी मांग हमेशा बनी रहती है। इन्हें तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

    भारतीय प्रमुख कार्प (IMC): इसमें रोहू, कतला और मृगल शामिल हैं। इन्हें एक ही तालाब की अलग-अलग परतों (सतह, मध्य और निचली परत) में एक साथ पाला जा सकता है।

    विदेशी कार्प: ग्रास कार्प और कॉमन कार्प, जो बहुत तेजी से बढ़ती हैं।

    हाई-वैल्यू मछलियां (कैश क्रॉप): पंगासियस (प्यासी), तिलापिया और मांगुर। ये मछलियां कम ऑक्सीजन में भी तेजी से बढ़ती हैं और 6 से 8 महीने में बिक्री के लिए तैयार हो जाती हैं।

    मत्स्य पालन में न्यूनतम लागत

    यदि आपके पास खुद की जमीन या तालाब उपलब्ध है, तो 1 एकड़ के तालाब के लिए एक अनुमानित न्यूनतम वार्षिक परिचालन लागत (Running Cost) लगभग ₹70,000 से ₹1,00,000 तक आती है:

    तालाब की तैयारी (चूना/गोबर): ₹5,000 – ₹8,000

    मछली के बच्चे (Seed): ₹10,000 – ₹15,000 (8,000 से 10,000 फिंगरलिंक्स)

    मछली का दाना (Feed): ₹50,000 – ₹70,000 (सरसों की खली, राइस ब्रान या कमर्शियल फीड)

    दवाइयां व अन्य खर्च: ₹5,000

    उत्पादन और शुद्ध मुनाफा

    मत्स्य पालन में मुनाफे का अनुपात आमतौर पर 1:2 का होता है, यानी लागत की तुलना में मुनाफा दोगुना तक हो सकता है:

    उत्पादन: 1 एकड़ के वैज्ञानिक प्रबंधन वाले तालाब से एक साल में लगभग 3,000 से 4,000 किलोग्राम (3 से 4 टन) मछली का उत्पादन होता है।

    कमाई: यदि औसतन बाजार भाव ₹130 से ₹150 प्रति किलो भी मिले, तो कुल बिक्री लगभग ₹5,20,000 तक हो सकती है।

    शुद्ध लाभ: कुल कमाई में से परिचालन लागत को घटाकर प्रति एकड़ ₹3,50,000 से ₹4,00,000 तक का शुद्ध वार्षिक लाभ आसानी से कमाया जा सकता है।

    व्यवसाय के लिए आवश्यक योग्यता

    मत्स्य पालन शुरू करने के लिए किसी बड़ी शैक्षणिक डिग्री की आवश्यकता नहीं है, बल्कि व्यावहारिक समझ जरूरी है:

    बुनियादी साक्षरता: दाने, दवाइयों के अनुपात और पैसों का हिसाब-किताब रखने के लिए।

    तकनीकी प्रशिक्षण: नुकसान से बचने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या जिला मत्स्य विभाग से 5 से 7 दिनों का प्रशिक्षण जरूर लें।

    जल प्रबंधन की समझ: पानी का पीएच (pH) स्तर, अमोनिया नियंत्रण और ऑक्सीजन स्तर को बनाए रखने की बुनियादी जानकारी।

    पात्रता और दस्तावेज

    खुद की जमीन या 5-10 साल की लीज (पट्टा) के कागजात होने चाहिए, ताकि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत 40% से 60% तक की सरकारी सब्सिडी और बैंक लोन का लाभ लिया जा सके।