कटिहार में नदियों ने निगल लिए 30 गांव, 25 हजार परिवारों से छिन गई पहचान
कटिहार में गंगा और महानंदा नदियों के कटाव से 30 से अधिक गांव और 25 हजार परिवार विस्थापित हो गए हैं, जिससे उनकी पहचान और आजीविका छिन गई है। ...और पढ़ें

कटिहार में नदियों का कहर: 30 गांव निगले, 25 हजार परिवारों की पहचान मिटी
HighLights
कटिहार में गंगा-महानंदा कटाव से 30 गांव नदी में समाए।
पच्चीस हजार से अधिक परिवार विस्थापन का दर्द झेल रहे हैं।
स्थायी पुनर्वास के अभाव में लोग अस्थायी ठिकानों पर मजबूर।
आशीष सिंह चिंटू, कटिहार। कटिहार में गंगा और महानंदा की धाराएं हर साल सिर्फ जमीन नहीं काटतीं, बल्कि लोगों की पीढ़ियों की मेहनत, सपने और पहचान भी बहा ले जाती हैं। जिले में अब तक करीब 30 गांव और टोले नदी के गर्भ में समा चुके हैं।
इसके साथ ही 25 हजार से अधिक परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन, घर और रोजी-रोटी से बेदखल होकर विस्थापन का दर्द झेल रहे हैं। इन सबसे के बीच बड़ा सवाल यह बना है कि आखिर इन परिवारों का कसूर क्या था? उनका अपराध सिर्फ इतना था कि वे नदी किनारे बसे थे।
वर्षों से कटाव रोकने और स्थायी पुनर्वास के दावे होते रहे, लेकिन हालात नहीं बदले। सरकारी फाइलों में योजनाएं दौड़ती रहीं, जबकि हकीकत में हजारों लोग आज भी तटबंधों, सरकारी जमीनों और सड़क किनारे टीन की झोपड़ियों में जिंदगी काट रहे हैं।
एक समय जिन किसानों की पहचान सैकड़ों कट्ठा उपजाऊ जमीन से थी, वे आज मजदूरी कर परिवार पालने को मजबूर हैं। खेत गंगा में समा गए, मकान मिट्टी में मिल गए और संपन्न परिवार विपन्नता की ऐसी खाई में धकेल दिए गए, जहां से निकलना आसान नहीं है।
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ऐसे में कटाव प्रभावित बरारी के बबलू सिंह, पंकज सिंह, छोटलाल साह, अशोक महलदार व अमदाबाद के विस्थापित भोला भंडल, बूटन मंडल, शंकर मंडल, राम अवतार सिंह, खुशी लाल दास, मो जमशेद, मोतीउर रहमान समेत अन्य सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक घर उजड़ते रहेंगे? कब मिलेगा स्थायी पुनर्वास? कब बनेगा ऐसा तटबंध जो गांवों को बचा सके?
बहरहाल, इसका जवाब जिम्मेदार ही जाने लेकिन कटिहार में बाढ़ और कटाव अब सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी बन चुका है। नदी नया भूगोल लिख रही है।
मनिहारी : जहां गांव नहीं, अब सिर्फ बहती नदी
मनिहारी प्रखंड में दशकों से गंगा की विनाशलीला जारी है। मदारीचक, समदा, बैजनाथपुर, बोलिया दियारा, महेशपुर, गुवागाछी, तेजनारायणपुर, मेदनीपुर और बघार सहित दर्जनों गांव और टोले गंगा में विलीन हो चुके हैं। नदी ने केवल लोगों के आशियाने ही नहीं छीने, बल्कि सड़क, विद्यालय और अन्य सरकारी परिसंपत्तियों को भी निगल लिया।
प्राणपुर : गांवों की जगह अब बह रही महानंदा की धारा
प्राणपुर प्रखंड के जल्लाह रामपुर, ओरलाबाड़ी, पुरानी मकरचल्लाह और लालगंज भगत टोला महानंदा नदी के कटाव में पूरी तरह समा गए। इन गांवों में कभी दो से ढाई हजार लोगों की चहल-पहल रहती थी। आज वहां सिर्फ नदी की धारा बहती है।
विस्थापित परिवारों में कुछ ने दूसरे गांवों में जमीन खरीद ली, लेकिन बड़ी संख्या में लोग आज भी तटबंधों और रेलवे लाइन किनारे अस्थायी झोपड़ियों में रहने को विवश हैं।
बरारी : गांव मिट गए, नाम आज भी जिंदा
बरारी प्रखंड के हासिमपुर, दरवै, जलवाही, पकहरा, काढ़ागोला घाट, बकिया रानीचक, सरदार नगर, भवानीपुर, कुंतलनगर, भरौली, सोती और गुरु मेला गांव कटाव की भेंट चढ़ चुके हैं।
विस्थापित लोग अलग-अलग स्थानों पर बस गए, लेकिन अपने गांव की स्मृतियों को बचाने के लिए नई बस्तियों का नाम आज भी नया टोला दरवै, नया टोला जरलाही जैसे पुराने नामों पर रखा है।
अमदाबाद: कट गया बहती नदी
प्रखंड के लोग 1980 से कटाव की यातना झेल रहे हैं। अब तक जामुन तल्ला, कोशी जल्ली टोला, खट्टी, खट्टी किशनपुर, धन्नी टोला, रामायणपुर, नवरसिया गंगा नदी विलीन होकर अपनी अस्तित्व खो चुकी है।
विस्थापितों को बसाने को लेकर प्रक्रिया की जा रही है। इसी 15 अगस्त को नौ सौ परिवारों को बासगीत पर्चा वितरित किया जाएगा। इसके लिए सभी अंचलाधिकारी को निर्देशित किया गया है। - डॉ. विनोद कुमार, एडीएम, कटिहार