विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

पूर्वी चंपारण में रेज्ड बेड तकनीक से मक्का की खेती, जलजमाव से मुक्ति और बंपर पैदावार

Published: Mon, 07 Sep 2026 05:55 AM (GMT+05:30)

Raised Bed Maize Farming: पूर्वी चंपारण में खरीफ मौसम में जलजमाव से जूझ रहे किसानों के लिए रेज्ड बेड तकनीक ...और पढ़ें

इस पद्धति के तहत ऊंची उठी क्यारियों पर मक्का की बुआई की जाती है। (AI Generated Image)

इस पद्धति के तहत ऊंची उठी क्यारियों पर मक्का की बुआई की जाती है। (AI Generated Image)

संवाद सहयोगी, पीपराकोठी (पूर्वी चंपारण)। KVK Piprakothi Scientists: खरीफ मौसम में भारी बारिश और खेतों में जलभराव की मार झेलने वाले पूर्वी चंपारण के किसानों के लिए आधुनिक रेज्ड बेड तकनीक एक बड़ा संबल बनकर उभरी है।

इस उन्नत पद्धति के तहत खेत की सामान्य सतह से ऊंची उठी क्यारियों पर मक्का की बुआई की जाती है।

कृषि विज्ञान केंद्र पीपराकोठी के प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अरविंद कुमार सिंह के अनुसार, मक्का जलजमाव के प्रति बेहद संवेदनशील फसल है, जिसके चलते यह तकनीक जल निकासी का सबसे पुख्ता समाधान साबित हो रही है।

ऑक्सीजन संकट से बचाव

खेतों में कई दिनों तक पानी जमा रहने से पौधों की जड़ों तक प्राणवायु यानी ऑक्सीजन का संचार बाधित हो जाता है। इससे जड़ों का स्वाभाविक फैलाव रुकने के साथ मिट्टी से पोषक तत्वों का अवशोषण भी काफी कम हो जाता है, जिससे सीधा नुकसान उत्पादन पर पड़ता है।

रेज्ड बेड तकनीक में क्यारियों के बीच व्यवस्थित नालियां बनी होती हैं, जिनसे बारिश का अतिरिक्त पानी तुरंत बाहर निकल जाता है।

बेड निर्माण का सही मानक

वैज्ञानिकों के अनुसार इस पद्धति में 67 से 70 सेंटीमीटर चौड़े उठे हुए बेड बनाकर मक्का की बुआई करना सबसे मुफीद माना गया है।

प्रत्येक बेड पर पौधों के बीच 18 से 20 सेंटीमीटर की दूरी और बीज की गहराई चार से पांच सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए। इस तकनीकी प्रबंधन से प्रति हेक्टेयर 70 से 75 हजार स्वस्थ पौधों की मानक संख्या खेत में आसानी से हासिल की जा सकती है।

समय पर बुआई के फायदे

पूर्वी चंपारण के कृषि परिवेश में मध्य जून से जुलाई के पहले सप्ताह तक रेज्ड बेड पर बुआई संपन्न कर लेना किसानों के लिए बेहद लाभकारी रहता है।

अगली रबी फसल की समय पर तैयारी के लिए 90 से 105 दिन में तैयार होने वाली उन्नत संकर प्रजातियों का ही चयन करना चाहिए। समय से खेत खाली हो जाने से किसान अक्टूबर में सरसों और नवंबर में समय पर गेहूं की बुआई बिना किसी देरी के कर सकते हैं।

संसाधनों की भारी बचत

आधुनिक बेड प्लांटर मशीन के उपयोग से बेड तैयार करने, सटीक गहराई पर बीज डालने और खाद की बैंड प्लेसमेंट का कार्य एक साथ संपन्न हो जाता है। इससे किसानों के श्रम, समय, डीजल खपत और कृषि यंत्रों पर होने वाले अतिरिक्त वित्तीय खर्च में बड़ी बचत होती है।

उठी हुई भुरभुरी मिट्टी में रहने के कारण पौधों द्वारा नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे आवश्यक पोषक तत्वों का उपयोग भी काफी कुशलता से होता है।

उपज में बंपर इजाफा

पारंपरिक समतल बुआई की तुलना में रेज्ड बेड तकनीक अपनाने से परिस्थितियों के अनुसार 15 से 25 प्रतिशत तक अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है। उठी हुई क्यारियों पर इंसानों या मवेशियों के पैर न पड़ने से मिट्टी में वायु संचार बेहतर बना रहता है और जड़ गलन की समस्या खत्म हो जाती है।

यह पद्धति मक्का के साथ-साथ कंदवर्गीय फसलों, सब्जियों और दलहन की खेती में भी जलभराव वाले इलाकों के लिए अचूक साबित हो रही है।