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    तिरंगा फहराने पर झेली यातनाएं, चली गई आंखों की रोशनी; दिल दहला देगी डुमरांव के सेनानी जवाहर लाल की कहानी

    Updated: Sun, 09 Aug 2026 04:45 PM (IST)

    जवाहर लाल श्रीवास्तव ने 1942 में डुमरांव थाने पर तिरंगा फहराकर अंग्रेजों को चुनौती दी, जिसके लिए उन्हें बर्बर यातनाएं सहनी पड़ीं और आंखों की रोशनी चली ...और पढ़ें

    जवाहर लाल श्रीवास्तव। फोटो जागरण

     जवाहर लाल श्रीवास्तव। फोटो जागरण

    रंजीत कुमार पांडेय, डुमरांव (बक्सर)। आजादी की लड़ाई में डुमरांव की धरती ने भी कई ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी पूरी जवानी न्योछावर कर दी। इन्हीं वीरों में जवाहर लाल श्रीवास्तव का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

    16 अगस्त 1942 को डुमरांव थाने पर तिरंगा फहराकर अंग्रेजी शासन को चुनौती देने वाले जवाहर लाल को अंग्रेज सैनिकों ने गिरफ्तार कर बर्बर यातनाएं दीं। बर्फ की सिल्ली पर लिटाकर पीटा गया। इस यातना में उनकी आंखों की रोशनी चली गई।

    करीब सात वर्ष तक जेल की यातनाएं सहने के बाद जब वह घर लौटे, तो इलाज में परिवार की पूरी संपत्ति तक बिक गई। आजादी के बाद भी उन्होंने बलिदानियों की स्मृतियों को जीवित रखने का प्रयास किया, लेकिन उनके निधन के बाद परिवार धीरे-धीरे गुमनामी में चला गया।

    नेताजी सुभाषचंद्र बोस से था करीबी संबंध

    पांच फरवरी 1915 को डुमरांव के लाला टोली मोहल्ले में जन्मे जवाहर लाल श्रीवास्तव के पिता विश्वनाथ लाल प्रसिद्ध डीड राइटर थे। जवाहर लाल का नेताजी सुभाषचंद्र बोस से करीबी संबंध था। वह भारतीय फारवर्ड ब्लाक के शाहाबाद जोन के महासचिव भी रहे।

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    आठ अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत के बाद उन्होंने साथियों के साथ अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाल लिया। उनके नेतृत्व में स्टेशन पर कार्रवाई, रेलवे लाइन उखाड़ने, डाकघर जलाने और सरकारी शराब डिपो पर हमला जैसी कई गतिविधियां हुईं।

    तिरंगा फहराते ही टूटा अंग्रेजों का कहर

    16 अगस्त 1942 को डुमरांव थाने पर तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेज सैनिकों ने आंदोलनकारियों पर कहर बरपा दिया। इस दौरान जवाहर लाल के बड़े भाई बिहारी लाल और प्रद्युम्न लाल को सिपाहियों ने लाठियों और बूटों से पीट-पीटकर बलिदान कर दिया। जवाहर लाल को गिरफ्तार कर लिया गया।

    अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें बर्फ की सिल्ली पर लिटाकर बेरहमी से पीटा। यातना का असर इतना भयावह था कि उनकी आंखों की रोशनी चली गई। उन्हें 24 घंटे तक एकांत सेल में रखा गया।

    इसके बाद करीब सात वर्ष तक जेल की यातनाएं सहनी पड़ीं। जेल से लौटने के बाद उनकी हालत बेहद खराब थी। इलाज में परिवार की पूरी संपत्ति बिक गई। इसके बावजूद देश की आजादी और बलिदानियों की स्मृतियों के प्रति उनका समर्पण कम नहीं हुआ।

    शहीद स्मारक समिति की रखी नींव

    आजादी के बाद जवाहर लाल श्रीवास्तव ने बलिदानियों की स्मृतियों को संजोने का बीड़ा उठाया। वह शहीद स्मारक समिति के संस्थापक बने और प्रत्येक वर्ष 16 अगस्त को बलिदानियों की याद में कार्यक्रम आयोजित करते रहे।

    उनके योगदान को देखते हुए 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिल्ली के लाल किले पर उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था। यह ताम्रपत्र आज भी उनके परिवार के पास स्वतंत्रता संग्राम की अमूल्य धरोहर के रूप में सुरक्षित है।

    वीर की मौत के बाद परिवार से भी मुंह मोड़ा

    14 सितंबर 2008 को जवाहर लाल श्रीवास्तव का निधन हो गया। उनके बेटे लाल मोहन श्रीवास्तव और अनिल श्रीवास्तव बताते हैं कि बाबूजी के जीवित रहने तक 26 जनवरी और 15 अगस्त को प्रशासनिक अधिकारी व जनप्रतिनिधि उनका हाल-चाल जानने पहुंचते थे। परिवार के सदस्य अमित कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि उनके घर के आंगन में कभी डा. राजेंद्र प्रसाद और बाबू जगजीवन राम जैसे नेता बैठते थे।