678 मौतें गिनता प्लेटफार्म, आखिर कब जागेगा रेलवे? आरा जंक्शन की चौंकाने वाली हकीकत
आरा जंक्शन के प्लेटफार्म 2 और 3 यात्रियों के लिए खतरनाक बन गए हैं। पिछले तीन वर्षों में 678 मौतें दर्ज की गई हैं, जो प्लेटफार्म की कम ऊंचाई और अव्यवस् ...और पढ़ें

ट्रेन से उतरते समय रहता है खतरा। जागरण
HighLights
आरा जंक्शन के प्लेटफार्म 2-3 बने यात्रियों के लिए खतरनाक।
तीन वर्षों में 678 मौतें, प्लेटफार्म की कम ऊंचाई मुख्य कारण।
2016 से लंबित प्लेटफार्म उन्नयन कार्य, रेलवे लापरवाही उजागर।
जागरण संवाददाता, आरा। भोजपुर जिले का आरा जंक्शन, जो पूर्व मध्य रेलवे के दानापुर मंडल का एक प्रमुख स्टेशन है, आज यात्रियों के लिए सुविधा नहीं बल्कि खतरे का प्रतीक बनता जा रहा है।
पटना–पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलखंड पर स्थित इस व्यस्त स्टेशन से रोजाना 50 से 60 हजार यात्री सफर करते हैं, लेकिन प्लेटफार्म संख्या 2 और 3 की जर्जर हालत ने यहां हर दिन हजारों लोगों की जान जोखिम में डाल दी है।
3 साल में 678 मौतें, चौंकाने वाले आंकड़े
वर्ष 2023 से 2026 के बीच महज तीन वर्षों में 678 लोगों की मौत हो चुकी है।
- 2023: 225 मौतें
- 2024: 201 मौतें
- 2025: 224 मौतें
- 2026 (अब तक): 28 मौतें
ये मौतें किसी बड़ी रेल दुर्घटना में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की अव्यवस्था और लापरवाही के कारण हो रही हैं।

(स्टेशन के पश्चिमी छोर की तरफ टूटा पड़ा प्लेटफॉर्म।)
प्लेटफार्म की कम ऊंचाई हादसों की वजह
प्लेटफार्म संख्या 2 और 3 की ऊंचाई रेलवे मानक से काफी कम है। ट्रेन और प्लेटफार्म के बीच ज्यादा गैप होने से यात्रियों को कूदकर चढ़ना-उतरना पड़ता है।
ऐसे में फिसलना, संतुलन बिगड़ना या ट्रेन की चपेट में आना आम हो गया है। महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे और दिव्यांग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
10 साल से अधूरा निर्माण
रेलवे रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2016 में तत्कालीन डीआरएम आरपी ठाकुर ने प्लेटफार्म 2 और 3 को ऊंचा करने की घोषणा की थी।
टेंडर भी जारी हुआ, लेकिन विभागीय खींचतान और ठेकेदारी विवाद के कारण काम शुरू ही नहीं हो सका। करीब एक दशक बाद भी फाइलें दफ्तरों में लंबित हैं, जबकि हर साल दर्जनों लोग जान गंवा रहे हैं।
हर ट्रेन के साथ बढ़ता खतरा
ट्रेन रुकते ही प्लेटफार्म 2 और 3 पर अफरा-तफरी मच जाती है। जल्दी चढ़ने-उतरने की होड़ में यात्री अपनी जान जोखिम में डालते हैं। मौके पर पर्याप्त सुरक्षा या प्रबंधन की व्यवस्था नहीं होने से हादसों का खतरा और बढ़ जाता है।
सबसे बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?
क्या यह सिर्फ तकनीकी खामी है या प्रशासनिक लापरवाही? रेलवे के इंजीनियरिंग, निर्माण और प्रशासनिक विभागों के बीच समन्वय की कमी साफ नजर आती है। टेंडर जारी होने के बाद भी काम शुरू न होना गंभीर सवाल खड़े करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्लेटफार्म की मानक ऊंचाई 840 मिमी होनी चाहिए, जबकि यहां यह काफी कम है।
क्या हो सकता है समाधान?
- प्लेटफार्म की ऊंचाई तुरंत बढ़ाई जाए
- अस्थायी स्टेप/पोर्टेबल प्लेटफार्म की व्यवस्था हो
- भीड़ नियंत्रण के लिए अतिरिक्त स्टाफ तैनात हो
यात्रियों की जुबानी दर्द
- जय मंगल सिंह: “हर बार उतरते वक्त जान जोखिम में लगती है।”
- सोमनाथ कुमार: “बच्चों के साथ उतरना सबसे मुश्किल है, हादसा कभी भी हो सकता है।”
- भीम सोनी: “यह प्लेटफार्म नहीं, मौत का जाल है।”
- प्रिया प्रभाकर: “बरसात में हालत और खराब हो जाती है।”
- रीमा कुमारी: “भीड़ में हमेशा डर लगा रहता है।”
- पवन कुमार (अधिवक्ता): “यह स्थिति शर्मनाक है, मानवाधिकार आयोग को संज्ञान लेना चाहिए।”