विक्रमशिला अभयारण्य : भागलपुर के गंगा दियारा में दुर्लभ 'कैंची चोंच' वाले इंडियन स्किमर ने दिया तीन बच्चों को जन्म
Bhagalpur Vikramshila Sanctuary: भागलपुर के गंगा दियारा में दुर्लभ इंडियन स्किमर पक्षी ने तीन बच्चों को जन्म दिया है, जो ...और पढ़ें
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Bhagalpur Vikramshila Sanctuary: इंडियन स्किमर पक्षी।
HighLights
भागलपुर गंगा दियारा में दुर्लभ इंडियन स्किमर ने तीन बच्चों को जन्म दिया।
'कैंची चोंच' वाले इस पक्षी का झुंड बच्चों संग सुरक्षित लौटा।
यह घटना क्षेत्र के समृद्ध पारिस्थितिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
ललन तिवारी, भागलपुर। Bhagalpur Vikramshila Sanctuary: राष्ट्रीय जलीय जीव गांगेय डॉल्फिन के संरक्षण के लिए दुनिया भर में विख्यात 'विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य' ने जैव-विविधता के पटल पर एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। यह अभयारण्य अब केवल जलीय जीवों का ही नहीं, बल्कि दुनिया के अत्यंत दुर्लभ और संकटग्रस्त नदी पक्षियों का भी पसंदीदा प्रजनन स्थल बन चुका है।
इसी कड़ी में अनोखी 'कैंची जैसी चोंच' के लिए वैश्विक पहचान रखने वाले पक्षी 'इंडियन स्किमर' (पनचीरा) ने भागलपुर के गंगा दियारा को अपना नया आशियाना बनाकर यहां तीन नन्हें बच्चों को जन्म दिया। ठंड का मौसम बीतने और बच्चे उड़ने लायक होने के बाद स्किमर का झुंड अपने तीनों बच्चों को साथ लेकर सुरक्षित गंतव्य की ओर लौट गया।
सर्दियों में फिर आने की उम्मीद
पर्यावरणविदों और पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि भागलपुर के गंगा दियारा में संकटग्रस्त पक्षी का इस तरह सुरक्षित प्रजनन करना यह साबित करता है कि यहां का पर्यावरण, जल गुणवत्ता और रेतीले टापू पूरी तरह प्राकृतिक व अनुकूल हैं। हर वर्ष सर्दियों की शुरुआत में इस पक्षी का झुंड गंगा किनारे डेरा डालता है और तापमान बढ़ने के साथ प्रस्थान कर जाता है।

तीन बच्चों के साथ सुरक्षित लौटा झुंड
वन विभाग के आधिकारिक सर्वेक्षण के अनुसार, इस सीजन में इंडियन स्किमर ने भागलपुर गंगा क्षेत्र के शांत रेतीले दियारा में घोंसला बनाकर अंडे सेए थे। निगरानी के दौरान यहां तीन स्वस्थ बच्चे देखे गए। समय के साथ बच्चे वयस्क हुए, उन्होंने उड़ना सीखा और हाल ही में वयस्क परिंदों के साथ लंबी उड़ान भरते हुए क्षेत्र से विदा ली।
दुर्लभ 'इंडियन स्किमर' (Indian Skimmer): रोचक तथ्य व प्रोफ़ाइल
वैज्ञानिक पहचान: रिंकोप्स अल्बिकोलिस (Rynchops albicollis), जिसे हिंदी में 'पनचीरा' भी कहा जाता है।
संरक्षण स्थिति (IUCN): संकटग्रस्त (Endangered)।
शारीरिक बनावट: लंबाई लगभग 40 से 43 सेंटीमीटर। ऊपरी हिस्सा गहरा काला और निचला हिस्सा दूधिया सफेद। पैर चमकीले लाल और चोंच नारंगी-पीली।
विशिष्ट पहचान (कैंची चोंच): इसका निचला जबड़ा ऊपरी जबड़े से काफी लंबा होता है, जो पानी को कैंची की तरह चीरते हुए छोटी मछलियों को पकड़ता है।
पसंदीदा पर्यावास: गंगा जैसी बड़ी नदियों के शांत जलक्षेत्र, प्रदूषण मुक्त पानी और बालू के निर्जन रेतीले टापू।
प्रजनन का महत्व: खनन और जल प्रदूषण के बीच भागलपुर दियारा में इसका प्रजनन इस क्षेत्र के उच्च पारिस्थितिक स्वास्थ्य (Ecological Health) को दर्शाता है।
वन प्रमंडल पदाधिकारी (डीएफओ) आशुतोष राज ने बताया कि इंडियन स्किमर का भागलपुर के गंगा क्षेत्र में नियमित आना और यहां वंश वृद्धि करना जैव-विविधता के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धि है। आगामी सर्दियों के मौसम में इस दुर्लभ परिंदे के फिर से भागलपुर लौटने की प्रबल संभावना है। वन विभाग प्रवासी पक्षियों के प्राकृतिक पर्यावास, विशेषकर रेतीले टापुओं को मानवीय दखल और अवैध खनन से सुरक्षित रखने के लिए लगातार निगरानी अभियान चला रहा है।
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पानी चीरती 'कैंची चोंच' बनाती है इसे दुनिया में बेमिसाल
इंडियन स्किमर की सबसे अद्भुत विशेषता उसकी शारीरिक बनावट, विशेषकर चोंच है। प्रकृति ने इसे ऐसी चोंच दी है जिसका निचला हिस्सा ऊपरी हिस्से की तुलना में काफी लंबा और चपटा होता है। भोजन की तलाश में यह पक्षी जल की सतह के बेहद करीब, लगभग छूते हुए तेजी से उड़ता है। उड़ान के दौरान यह अपनी लंबी निचली चोंच को पानी के भीतर डुबोकर कैंची की भांति आगे बढ़ाता है।
जैसे ही कोई छोटी मछली, झींगा या अन्य जलीय जीव चोंच के संपर्क में आता है, यह पलक झपकते ही चोंच बंद कर शिकार को जकड़ लेता है। करीब 40 से 43 सेंटीमीटर लंबा यह पक्षी ऊपर से चमकीला काला, नीचे से सफेद, नारंगी चोंच और लाल पैरों वाला होता है। यह हमेशा शांत और एकांत रेतीले टापुओं पर झुंड में रहना पसंद करता है।
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IUCN की संकटग्रस्त सूची में शामिल
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) ने इंडियन स्किमर को संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में वर्गीकृत किया है। नदियों के प्राकृतिक बहाव में रुकावट, जल प्रदूषण, अंधाधुंध बालू खनन और नदी के रेतीले टापुओं पर मानवीय अतिक्रमण के चलते विश्व भर में इनकी आबादी तेजी से घट रही है। ऐसे नाजुक दौर में भागलपुर का गंगा दियारा इनके लिए एक सुरक्षित शरणस्थली साबित हो रहा है।
भागलपुर बना सुरक्षित ढाल
सुल्तानगंज से कहलगांव तक फैले इस अभयारण्य क्षेत्र में डॉल्फिन के साथ-साथ गरुड़, घड़ियाल और अब इंडियन स्किमर का फलता-फूलता कुनबा यह संदेश दे रहा है कि भागलपुर की गंगा का ईकोसिस्टम अत्यंत समृद्ध है। आने वाली सर्दियों में जब गंगा की रेती पर ‘कैंची चोंच’ वाले इन परिंदों का झुंड दोबारा उतरेगा, तब भागलपुर के पर्यावरण संरक्षण की गूंज देश-दुनिया में और प्रखर होगी।
