गंगा ही बाधा, गंगा ही राह: 15 मिनट का सफर 15 घंटे में, गंगा के रहमोकरम पर उत्तर-दक्षिण बिहार, जुड़ रहे अजनबियों के तार
Bhagalpur BIADA Ghat Ground Report: विक्रमशिला सेतु पर पहिए क्या थमे उत्तर और दक्षिण बिहार की दूरी माँ गंगा के ...और पढ़ें
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Bhagalpur BIADA Ghat Ground Report: भागलपुर में गंगा में फेरी सेवा शुरू की गई है।
HighLights
विक्रमशिला सेतु समस्या से गंगा यात्रा बनी मजबूरी, यात्रियों को दिक्कत।
बरारी बियाडा घाट पर आखिरी जहाज छूटा, यात्रियों ने रात बिताई।
अजनबी यात्रियों ने मुश्किल में एक-दूसरे का साथ दिया, रिश्ते जुड़े।
शंकर दयाल मिश्रा, भागलपुर। Bhagalpur BIADA Ghat Ground Report: सीन एक: रविवार शाम के पांच बजे हैं। बरारी बियाडा घाट से जहाज का आखिरी सायरन गूंजकर शांत हो गया। लोहे का रैंप खिंचा और जहाज गंगा की धार में मुड़ने लगा।
इधर, कुछ यात्री दरबट लगाते हुए पहुंचे, पर जहाज उनकी नजरों से दूर होता गया। इसके कुछ ही मिनट बाद बरारी बियाडा घाट पर बने सरकारी पंडाल में कई यात्री रात व्यतीत करने के मोड में बैठ गए। स्टेशन से टोटो से आए दुमका के रुपेश शर्मा, देवघर के सुमन, रजौन के सावन सिंह आदि आपस में बतिया भी रहे हैं।

सुमन कहते हैं- ‘अगर ये वजनी सामान साथ नहीं होता तो दौड़कर जहाज पकड़ लेते। अब कोई रास्ता नहीं... रात यहीं बितानी होगी।’ पंडाल में अभी करीब तीन दर्जन लोग ऐसे शरण ले रहे हैं, जिनका जहाज छूट गया है।
सभी अलग-अलग उम्र के हैं, रंग, कद-काठी और रहने वाले भी अलग-अलग जगहों के... जाना भी अलग-अलग जगह है। समानता सभी के पछताते चेहरों और खुद पर खीझ में है कि कुछ देर पहले आते तो जहाज नहीं छूटता और गंगा रास्ते की बाधा नहीं बनती!
सीन दो : रात के डेढ़ बजे हैं। प्रशासन के बनाए यात्री पंडाल यात्रियों से भरे पड़े हैं। अधिकतर सो चुके हैं। मच्छर काट रहे हैं और वे नींद में ही हाथ चला रहे हैं। कुछ कुर्सी पर ही सोए हैं और कुछ मोबाइल पर रील आदि देख रहे हैं। शाम में स्टेशन से टोटो से आए सभी यात्री आसपास ही सो रहे हैं, पर रुपेश जाग रहे हैं।
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उन्होंने कहा, ‘आपने कहा था कि रात में आएंगे, इसलिए इंतजार कर रहे थे।’ सच में...! यह पूछते ही रुपेश कहते हैं कि दरअसल इस माहौल में सोने की आदत नहीं है, इसलिए नींद नहीं आई। बाकी टोटो से साथ आए साथियों ने कहा था कि अगर जागते रहेंगे तो सामान देखते रहें। सुबह का इंतजार है कि जहाज चले और गंगा रास्ता दे!
सीन तीन : सोमवार सुबह के साढ़े पांच बजे हैं। बीते शाम टोटो से आए यात्रियों में रुपेश सोए हुए हैं। उनके सहयात्री उन्हें जगा रहे हैं। आंखें मलते हुए उठते हैं और सामने हमें देख लगभग झेंपते हुए बोले- ‘सुबह के वक्त नींद आ गई थी...!’
पंडाल में रात में शरण लेने वाले लगभग सभी यात्री जग चुके हैं। वे अंगड़ाई लेकर शरीर का आलस्य दूर करते हैं और अपनी गठरी-बच्चे समेटने लगते हैं। इस वक्त तक शहर की ओर से सैकड़ों मुसाफिरों का रैला भी घाट पर पहुंच गया है। तभी एक जहाज ने हार्न बजाया और पंडाल की अलसाई सुबह में फुर्ती भर गई। सभी यात्री तेजी से जहाज पर सवार होने चल दिए कि रात भर के इंतजार के बाद गंगा ने जाने की राह दे दी है।
विक्रमशिला सेतु पर पहिए क्या थमे, उत्तर और दक्षिण बिहार की दूरी मां गंगा के रहमोकरम पर आ टिकी है। अब यहां यात्रियों के लिए गंगा ही बाधा है और गंगा ही राह। 15 मिनट का रास्ता घंटों में तय हो रहा है और जिनका आखिरी जहाज छूट गया, उनका यह सफर कम से कम 13 घंटे बढ़ जाता है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। यह घाट समाज की परिभाषा को परिभाषित कर रहा है। स्टेशन से टोटो से आए वे छह यात्री, जो एक-दूसरे से अनजान थे, अब एक-दूसरे का ख्याल रख रहे थे। शाम में जब सभी पंडाल में खुद को व्यवस्थित कर चुके तो चिंता रात के खाने की थी- क्या खाएंगे, कहां खाना मिलेगा।
तय हुआ कि एक-दो आदमी सामान की रखवाली करेंगे और बाकी खाने जाएंगे। जो बाहर जाएंगे, वे लौटते वक्त यहां रहने वालों के लिए भी खाना लेते आएंगे। सुबह इन लोगों ने कहा- ‘कल शाम तक हम एक-दूसरे से अनजान थे, लेकिन अब एक-दूसरे का नंबर ले लिया है।’ सुमन को कटिहार जाना है, रुपेश को बारसोई और सावन को कुर्सेला...!
नवगछिया के विपिन सिंह ने उनसे कहा- ‘गाड़ी आप सभी को नवगछिया से ही मिलेगी। पहले सभी मेरे घर चलें। वहां चाय-पानी करें, फिर गाड़ी पकड़ लें।’ इस तरह, शाम तक जो छह लोग एक-दूसरे के लिए अजनबी थे, सुबह वे एक-दूसरे के सफर का हिस्सा बन चुके थे।
