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    बांका : प्रियदर्शिनी ट्विंकल ने पिता को दी अंतिम विदाई, शव को कांधा देकर श्‍मशान घाट में दी मुखाग्नि

    Updated: Sat, 14 Mar 2026 10:22 PM (GMT+05:30)

    बौंसी, बांका में प्रियदर्शिनी ट्विंकल ने अपने दिवंगत पिता यतींद्र शर्मा को मुखाग्नि देकर सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ा। पुत्र संतान न होने पर उन्होंने पूर ...और पढ़ें

    बांका के बौंसी की प्रियदर्शिनी ने निभाई पिता की अंतिम यात्रा

    बांका के बौंसी की प्रियदर्शिनी ने निभाई पिता की अंतिम यात्रा

    HighLights

    1. प्रियदर्शिनी ट्विंकल ने पिता यतींद्र शर्मा को मुखाग्नि दी।

    2. पुत्र न होने पर बेटी ने निभाया अंतिम संस्कार का फर्ज।

    3. यह कदम महिला सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव का प्रतीक।

    संवाद सहयोगी, बौंसी (बांका)। कहते हैं कि बेटियां बेटों से कम नहीं होतीं। बौंसी थाना कॉलोनी निवासी दिवंगत यतींद्र शर्मा की इकलौती पुत्री प्रियदर्शिनी ट्विंकल ने इस कहावत को सच कर दिखाया। पिता के असामयिक निधन के बाद उन्होंने मंदार मुक्तिधाम में अपने पिता को मुखाग्नि दी और पूरे विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार की रस्में निभाईं।

    जानकारी के अनुसार, यतींद्र शर्मा (55) निजी इंश्योरेंस कंपनी में कार्यरत थे। मंगलवार को उनका हार्ट अटैक से अचानक निधन हो गया। परिवार में शोक का माहौल था क्योंकि उनकी कोई पुत्र संतान नहीं है। ऐसे समय में प्रियदर्शिनी ने साहस और दृढ़ता का परिचय दिया।

    हिंदू परंपरा में सामान्यत: पुत्र द्वारा ही पिता का अंतिम संस्कार किया जाता है। लेकिन प्रियदर्शिनी ने इस रूढ़िवादी सोच को चुनौती दी और समाज को यह संदेश दिया कि बेटियां भी परिवार और परंपरा की जिम्मेदारी निभाने में सक्षम हैं। उनके इस कदम की पूरे क्षेत्र में प्रशंसा हो रही है।

    प्रियदर्शिनी की यह पहल न केवल पारिवारिक परंपराओं को बदलने वाली है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव और महिला सशक्तिकरण का उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। बौंसी के स्थानीय लोग और पड़ोसी इस साहसिक कदम की सराहना कर रहे हैं। कई लोग मानते हैं कि यह घटना बेटियों के महत्व और उनके साहस को दिखाने वाली मिसाल बन गई है।

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    विशेषज्ञों के अनुसार, समय के साथ परंपराओं में बदलाव लाना जरूरी है और प्रियदर्शिनी का यह कदम इसका जीवंत उदाहरण है। उन्होंने पिता को सम्मानपूर्वक विदाई देकर यह साबित कर दिया कि बेटियां भी पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने और समाज में नई मिसाल कायम करने में सक्षम हैं।

    प्रियदर्शिनी का यह साहस भरा कदम समाज में जागरूकता फैलाने और लिंग-भेद को कम करने की दिशा में प्रेरक साबित हो रहा है। उनके पिता का अंतिम संस्कार पूरी विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ और प्रियदर्शिनी ने यह साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी चुनौती का सामना करने में बेटों से कम नहीं होतीं।